19/11/2025
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19 अगस्त 1941 उत्तराखंड के पौड़ी-गढ़वाल का बादयूं गांव… यहीं जन्मा था भारत का वो वीर, जिसका साहस आज भी सीमा की हवा में महसूस होता है—जसवंत सिंह रावत।
देशभक्ति इतनी कि 17 साल की उम्र में ही सेना में जाने निकल पड़े। उम्र कम थी, पर हौसला पहाड़ से बड़ा। आखिरकार 19 अगस्त 1960 को वे राइफलमैन बनकर भारतीय सेना का हिस्सा बने।
और फिर आया 1962…
17 नवंबर को चीन ने अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा जमाने की नीयत से हमला बोला। नूरानांग की चौकी की सुरक्षा में जसवंत सिंह, त्रिलोकी सिंह नेगी और गोपाल गुसांई तैनात थे।
तीन जवान… एक मिशन… और मौत के सामने भी न झुकने वाला जज्बा!
चीनी सेना के एक बंकर से हो रही मशीनगन की बरसात भारतीय जवानों को भारी पड़ रही थी। पर इन तीनों ने न हार मानी, न डर दिखाया। चट्टानों और झाड़ियों में छिपते हुए वे महज 15 यार्ड की दूरी तक दुश्मन के बंकर तक पहुंचे—
और हैंड ग्रेनेड फेंककर कई चीनी सैनिकों को ढेर कर मशीनगन छीन लाए!
इस एक कदम ने पूरी लड़ाई की दिशा बदल दी।
और फिर शुरू हुई वो जंग… जो भारत की कहानी बन गई!
जब पूरी यूनिट पीछे हट चुकी थी, तब जसवंत सिंह रावत अकेले मोर्चे पर डटे रहे।
वो अलग-अलग बंकरों से फायरिंग करते,
रात को हर बंकर में मशाल जलाते,
ताकि चीन को लगे—सैकड़ों भारतीय जवान लड़ रहे हैं!
72 घंटे…
बिना नींद, बिना खाना,
और फिर भी 300 से ज़्यादा चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया!
जब सच पता चला, तो चीनी कमांडर बौखला गया।
घेरकर हमला किया… और वीर जसवंत शहीद हुए।
चीन ने भी उनकी वीरता को सलाम करते हुए उन्हें और उनके अफसर को महावीर चक्र दिया।
जसवंतगढ़: जहां आज भी “जसवंत बहादुर” ड्यूटी पर हैं
नूरानांग में बना जसवंतगढ़ स्मारक आज भी सैनिकों के लिए श्रद्धा का स्थान है।
उनका बिस्तर, कपड़े, जूते—सब वैसा ही रखा है।
कहते हैं—कई बार जूतों पर कीचड़ मिलता है,
कभी चादर पर सिलवटें…
मानो जसवंत सिंह आज भी रात्रि गश्त से लौटे हों।
यहां से गुजरने वाला हर सैनिक—सिपाही से लेकर जनरल तक—सैल्यूट किए बिना नहीं जाता।
सेना ने उन्हें कई प्रमोशन भी दिए…
जैसे वो आज भी सैनिक नहीं,
बल्कि जसवंत बाबा के रूप में सीमा की रक्षा कर रहे हों।
🇮🇳 ऐसे अमर वीरों की गाथा हर भारतीय तक पहुँचे—यही सच्ची श्रद्धांजलि है!
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जय हिंद। 🙏🇮🇳