13/09/2021
प्राकृति से बातें कर पाता हूँ कि मैं कुछ जैसे-तैसे।
चादर-सी ओढ़ कर ये घटाएं
पर्वतों की घाटी के पीछे लुका-छिपी का खेल
खेल रही है
काम काज की भागदौड़ मे
मुस्कराना भी भूल गए
दुनिया से रिश्ता बनाने की चक्कर मे
प्राकृति से नाता जोड़ना ही भूल गए है