13/12/2021
#पाटई का पराठा - किस्सा सफर का
चौंकिए मत पाटई याने कोई अनाज नहीं है बल्कि जगह का नाम है।
1993 में सबसे पहले इस जगह जाना हुआ था।जूनियर चेम्बर jci के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष महोदय की गुना में रैली थी और मैं उनके साथ ही गुना गया था।रैली खत्म होने के बाद गुना के प्रसिद्ध दंत विशेषज्ञ और लायंस क्लब्स के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉ विष्णु गोयल जी हमें खाना खाने पाटई लेकर गए।आगरा बॉम्बे रोड हाईवे किनारे एक छोटी,धुंए की कालिख से पुते पतरे के शेड वाली दुकान जिसमें आगे भट्टी लगी हुई और उसपर शुद्ध घी में सिकते या कहें तलते हुए पराठे।पीछे शेड में 5-7 लकड़ी की बेंच और टेबल।गल्ले पर बैठे सेठ जी जैन साहब जिन्होंने वर्ष 1952 -53 के आसपास ये पराठे बनाकर बेचने शुरू किए और कालांतर में गांव के नाम से फेमस हो गए।बाद में 2 या 3 बार और भी गया और स्वादिष्ट पराठों का लुत्फ लिया लेकिन पिछले 12 -13 वर्ष से सड़क खराब होने से उस ओर निकलना नहीं हुआ।
पिछले दिनों शिवपुरी से लौटते हुए फिर याद आई और गूगल मैप पर सर्च करते हुए असली दुकान तक पहुंच ही गया क्योंकि अब फोर लेन बनने के बाद उस जगह का हुलिया भी बदल गया और ढेरों दूसरी दुकानें लग गई जो पाटई के पराठे बेच रही हैं।
तो अब साहब नए बने रेस्टोरेंट को जैन साहब का पोता चला रहा है (जो की 1995 में पैदा हुआ 😊) और पाटई के जैन रेस्टारेंट में हमने आर्डर दिया कि भाई एक पराठा और दाल तड़का देदे।
आटे में मोयन डालकर अच्छे से गूंधकर लच्छा पराठा स्टाइल में ही बड़ा पराठा बनाया जाए और उसे घी में तलकर साथ में दाल तड़का के साथ या आलू मटर की सब्जी के साथ खाया जाए तो खाने का मजा ही कुछ और है साथ में हरी चटनी,प्याज(जी हां),निम्बू और तली हुई हरी मिर्च फ्री।
गुना से शिवपुरी की तरफ बढ़ने पर लगभग 15 किलोमीटर आगे आता है ये छोटा सा गाँव।
जैसे दिल्ली के आगे मुरथल के पराठे प्रसिद्ध हैं उसी प्रकार मध्यप्रदेश की शान है ये पाटई के पराठे।लेकिन प्रचार प्रसार के अभाव और असली से ज्यादा नकली दुकानों की वजह से कम प्रसिद्ध हैं।
तो अगली बार कभी रोड ट्रिप पर गुना तरफ जाने का प्रोग्राम बने तो इन पराठों से मिलकर आना ये आपको अपना बना लेंगे
चित्र एवं कथा : अवनीश जैन