29/10/2024
जब किसी ने आचार्य जी के सामने *धनतेरस* की बात छेड़ी तो उन्होंने ये दोहा कहा:
*राम नाम कड़वा लगे, मीठे लागे दाम।*
*दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम॥*
दोहा तो सदियों पुराना है लेकिन हमारे उत्सवों की मौजूदा स्थिति को पूरी सटीकता से दर्शाता है।
दाम हमें मीठे लगते हैं, अख़बार, दुकान, सोशल मीडिया हमें अपनी ओर ललचाते हैं।
हर वर्ष जहाँ दफ़्तर, स्कूल या घर की व्यस्तता से कुछ समय मिलता है ‘राम’ के नाम पर,
वो भी ‘दाम’ के पीछे भागते हुए निकल जाता है।
*अब आप ही बताइए, जो ‘दाम’ पूरे साल आपका उद्धार नहीं कर पाया, वो राम के दिनों में फिर एक बार आता है एक नया मुखौटा पहनकर।*
_अब आपका उद्धार कैसे कर पाएगा?_
अब राम के दिनों में भी उसके आकर्षण में फँसे रह जाएँगे, तो 'दाम' और 'राम' दोनों हाथ से गँवाएँगे।
*‘दाम’ अपनी ओर पूरी ज़ोर से आपको पुकार रहा है,*
*लेकिन आप राम को ही चुनना।*
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त्योहारों के दिनों में ‘दाम’ हमारे सिर पर चढ़कर नाचता है, इसलिए आपको ‘राम’ तक लाने के लिए आचार्य जी व आपकी संस्था और अधिक मेहनत करनी पड़ती है।
*लेकिन बाज़ार के आघात से हम आपको सिर्फ़ मेहनत से नहीं बचा सकते।*
‘राम’ को भारत के आख़िरी व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए और समाज में मूलभूत बदलाव लाने के लिए बड़े संसाधनों की आवश्यकता है।
*धनतेरस के दिन आगे आएँ*
*स्वधर्म निभाएँ*: https://acharyaprashant.org/hi/contribute/contribute-work?cmId=m00013