01/02/2026
आज का दौर अजीब है।
सब कुछ बिकाऊ हो चुका है।
जिसके पास जो है, वही उसे पैक करके बेच रहा है।
ज्ञान, अनुभव, भावनाएँ, रिश्ते, और अब तो आध्यात्म भी।
सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब स्पिरिचुअलिटी और मेडिटेशन जैसी बातें भी “प्रोडक्ट” बन जाती हैं।
हमारी परंपरा में जो साधक सच में ऊँचाई तक पहुँचे, वे धन और शोहरत से ऊपर उठ गए।
उन्होंने ज्ञान को बाज़ार में नहीं उतारा, जीवन में उतारा।
लेकिन आज ज्ञान की नई पैकेजिंग का दौर है।
कैमरा, पॉडकास्ट, क्लिप्स, मोटिवेशनल टोन…
ऐसा प्रस्तुत किया जाता है मानो अंतिम सत्य मिल गया हो।
कुछ नाम जैसे आचार्य प्रशांत और विकास दिव्यकीर्ति अक्सर चर्चा में रहते हैं।
वे पढ़े-लिखे लोग हैं, सामान्य जन से अधिक अध्ययन किया है।
लेकिन जब ज्ञान ब्रांड बन जाए और ब्रांड व्यापार बन जाए, तब सवाल उठते हैं।
अगर किसी वीडियो को लाइक करने पर आपका डेटा लिया जाए,
फिर कॉल, मैसेज और लगातार मार्केटिंग शुरू हो जाए,
तो यह आध्यात्म नहीं, सेल्स फनल लगता है।
₹50 का सेशन, फिर दान, फिर और कार्यक्रम…
यह मॉडल आध्यात्मिक कम और कॉर्पोरेट अधिक दिखता है।
दूसरी ओर कोचिंग उद्योग है।
जहाँ 100 में से दो सफल होते हैं,
और 98 अपनी उम्मीद, समय और धन गंवा देते हैं।
फिर भी हम महानता, ईमानदारी और समाज सुधार के भाषण सुनते रहते हैं।
सवाल यह नहीं कि पैसा कमाना गलत है।
सवाल यह है कि क्या आप उसे सच के नाम पर कमा रहे हैं?
अगर ज्ञान सच में मुक्ति देता है,
तो वह व्यक्ति को लोभ से भी मुक्त करता है।
आज जरूरत है आँख खोलकर देखने की।
हर प्रभावशाली वाणी सत्य नहीं होती।
हर गंभीर चेहरा निष्काम नहीं होता।
सोचिए।
परखिए।
और किसी भी व्यक्ति को अंधविश्वास में देवता मत बनाइए।
आप क्या सोचते हैं?