02/04/2020
#कैर एक ऐसा पेड़ है जिस पर फल तो होते है पर पत्ते नही होते। इसका वैज्ञानिक नाम है। यह दक्षिण, मध्य एशिया, अफ्रीका और थार के मरुस्थल क्षेत्र में मुख्य रूप से पाया जाता है। भारत में कैर के पेड़ #राजस्थान में पाए जाते है।
कैर का पेड़
इस पेड़ पर साल में दो बार- मई और अक्टूबर में फल लगते है।
कैर के फूल
कैर के कच्चे फल
#केर नाम की एक कंटीली झाड़ी #रेगिस्तानी इलाकों में बहुतायत से पाई जाती है इस पर लगे छोटे छोटे बेरों के आकर के फल को ही केर कहते है। कैर के केरिया , सांगरी (खेजडे के वृक्ष की फली) काचर ,बोर (बैर के फल) और राजस्थान को छोड़कर तीनों लोकों में दुर्लभ है। कैर छोटे छोटे गोल गोल होते है। यह फल कडवा होता है इसलिए इसे खाने योग्य बनाने के लिए इसे मिटटी के एक बड़े मटके में पानी में नमक का घोल बनाकर उसमें इसे कई दिनों तक डुबोकर रखा जाता है जिससे इसका कड़वापन ख़त्म होकर खट्टा मीठा स्वाद हो जाता है।इसका बिना सुखाये भी आचार व सब्जी बनाकर सेवन किया जा सकता है। राजस्थान में आचार बनाने के लिए यह लोगों की पहली पसंद है। आजकल बाजार में सूखा केर उपलब्ध रहता है।
यह उदर (पेट) की सभी बीमारियों में लाभदायी है। जैसे खिंपोळी (संधिवात) जोड़ों के में दर्द में रामबाण औषधी है। ये प्रकृति का नियम है कि जिस क्षेत्र में जो रोग ज्यादा होता है। वहां उस रोग की प्राकृतिक औषधियों की पैदावार अधिक होती हैं। ये सब्जियां साल भर रखनी हो तो इन्हें काम में लेने से पहले उबालना चाहिए।
स्वादिष्टबनती है सब्जी और अचार : केर की सब्जी बनाने की विधि भी अलग है। जानकारी के अनुसार केर केर की सब्जी को अच्छी तरह से धोने के बाद कूटा जाता हैं तथा तेल में इसे पकाया जाता है। उसके बाद इस सब्जी को काफी समय तक काम में लिया जा सकता है। पुराने जमाने में मारवाड़ में पानी की कमी होती थी उस समय तत्कालीन ग्रामीण केर, सांगरी, कुमट, ग्वारफली को सब्जी के रूप में इस्तेमाल करते थे वहीं इसका दूसरा फायदा यह रहता है कि इनको सुखाकर काफी समय तक काम में लिया जा सकता है।
बाजरीराज्यों एवं विदेशों में बढ़ रही है मांग : रेगिस्तानीइलाके में उगने वाली कैर, सांगरी, कुमटिया, काचरी की मांग अप्रवासी राजस्थानी, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, पश्चिमी बंगाल आसाम सहित कई राज्यों विदेशों में भी मारवाड़ से मंगवा रहे हैं। वहां पर इनकी जबरदस्त मांग है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मारवाड़ में कैर की झाड़ सांगरी खेजड़ी के वृक्ष पर पैदा होती है। इस पर 43 डिग्री तापमान तेज बरसात का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। वहीं सूखी ग्वार फली को ग्वार की हरी फली को तेज धूप में सुखाकर सहेजा जाता है तथा काचरों को छोटे-छोटे हिस्सों में काटकर सूखी काचरी बनाई जाती है।
नईपीढ़ी का रुझान कम : कैर,कूमटिया, सूखी ग्वार फली, सूखी काचरी सांगरी से मारवाड़ की नई पीढ़ी का रुझान कम होता जा रहा है। इसके कारण मारवाड़ क्षेत्र के घरों में अब इसकी सब्जी अचार नाम मात्र के बनते हैं। हालांकि ग्रामीणांचल में बुजुर्ग आज भी इस सब्जी का उपयोग करते हैं। इसका एक कारण आर्थिक भी है। आजकल रोजगार की सहज उपलब्धता के कारण अधिकतर स्थानीय लोग खुद इन सब्जियों को सहेजने में रूचि नहीं दिखाते, क्योंकि इतने समय में वे अन्य काम में अधिक कमाई कर सकते हैं। जो पेशेवर लोग है,वे ही यह कार्य करते है। जिससे उन्हें उचित पारिश्रमिक मिल जाता हैं।