Mati Hindi Masik

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24/02/2026
13/03/2025

Har Prabhat Holi ban jaye, Har Sandhya Deewali, Har Dhamani me mukhur ho uthe, Shuddh Rakt kee Làlee.

26/08/2024
01/05/2020

हार की जीत --------------- राधा चरण शुक्ल और श्यामाचरण तिवारी की मित्रता आदर्श की एक मिसाल बन गयी थी | दोनों ही फतेहपुर जनपद के पूरे पण्डित गाँव में जन्में ,खेले ,लड़े ,मिले और और बड़े हुये थे | दोनों के घर भी पास -पास ही थे | दोनों के पिता मिडिल स्कूल में अध्यापक थे और मातायें सदगृहणीं थीं | दोनों ही औसत के कुछ ऊपर तीब्र बुद्धि के विद्यार्थी थे | परिवार का अध्यापन संस्कार उन्हें भी अध्यापन की दुनिया में ले आया | दोनों ने एम ० ए ० किया और बी ० एड ० किया | राधाचरण अंग्रेजी के प्राध्यापक थे और श्यामाचरण हिन्दी के | संयोग था कि दोनों की पहली नियुक्ति रायबरेली के सरकारी हायर सेकेण्डरी स्कूल में हुयी | नौकरी मिलते ही दोनों के माता -पिता ने उन्हें ऊँचे और शिक्षित घरों से शिक्षित लडकियां लेकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश करा दिया | रायबरेली में दोनों ने पास -पास के दो सरकारी क्वाटर्स पास -पास में अपने लिये एलाट करा लिये | थोड़ी बहुत दौड़ -धूप करनी पड़ी | पर पड़ोसी होनें के सुख ने दौड़ -धूप की तकलीफ को भुला दिया | दोनों अपनें -अपनें विषयों के गहरे विद्वान थे और स्कूल में उनकी अच्छी धाक थी | उन्हें शतरंज का भी शौक था | कभी श्यामाचरण के घर विसात विछती तो कभी राधाचरण के घर | कभी श्यामा जीतते तो कभी राधा | हार -जीत भी लक्ष्मी की तरह से चंचल होती है ,किसी एक स्थान पर रूककर नहीं रहती है | तीन वर्ष साथ -साथ रहने के बाद श्यामाचरण का तबादला उन्नाव जनपद में हो गया | राधाचरण रायबरेली में ही रहे | पत्र -व्यवहार और फोन से सम्पर्क की निरन्तरता बनी रही | प्रभु की कृपा के जिस महीनें श्यामा के घर पुत्र जन्मा उसी महीनें राधाचरण के यहां पुत्री का जन्म हुआ | जन्म में थोड़े बहुत दिन का ही अन्तर था | राधाचरण ने फोन पर बधाई देते हुए कहा कि श्यामा भाई तुम बाजी जीत गये | श्यामाचरण ने कहा कि अभी तो बाजी बराबर है | क़ानून ,संविधान नैतिकता और भारतीय संस्कृति लड़का और लड़की में भेद नहीँ करती | बाजी तो तुमनें जीती है क्योंकि तुम्हारे घर साक्षात लक्ष्मी अवतरित होकर आयी है | वर्ष पर वर्ष बीतते चले गये पर दोनों ही मित्र एक सन्तान से आगे नहीं बढ़े | श्यामाचरण ने पुत्र की शिक्षा और दीक्षा को पूरी जिम्मेदारी से संम्भाला | राधाचरण पुत्री को विदुषी बनाकर आदर्श के रूप में पल्लवित करनें की योजना में लग गये | शायामाचरण के पुत्र ने सूचना प्रोद्योगकीय में प्रथम श्रेणीं में एम ० टेक ० किया और उसे संयुक्त राष्ट्र अमरीका के सिलीकान वैली में 30 लाख वार्षिक पर एक कम्पनी नें हायर कर लिया | | राधाचरण की पुत्री ने संस्कृत में एम ० ए ० करके I. A.S. की प्रारम्भिक और मेन दोनों परीक्षायें पास कीं पर साक्षात्कार में वह मैरिट में नहीं आ पायी | राधाचरण ने फिर भाई श्यामा को फोन किया और कहा वह बाजी हार गये हैं | श्यामाचरण ने जवाब दिया कि अभी तो यह पहला राउण्ड ही है देखो अन्त में विजय श्री किसे वरण करती है | साथ ही उन्होनें कहा कि वे चाहेगें कि हम दोनों पुत्र और पुत्री को जीवन सहचर बनाकर अपनी मित्रता को प्रमाणित कर दें | राधाचरण ने उनका धन्यवाद किया पर कहा अभी एक दो वर्ष और प्रतीक्षा कर लेनी चाहिये | पुत्री को करियर के किसी निर्णायक मोड़ पर पहुँच जानें के बाद ही वे उसे गृहस्थ जीवन में डालना चाहेंगें | राधाचरण की पुत्री एक बुद्धिमान युवती थी उसने देखा कि अंग्रेजी पर अधिकार न होने के कारण वह साक्षात्कार में सफल नहीं हो पायी | I.A.S .की तैय्यारी करने के साथ -साथ उसनें अंग्रेजी भाषा पर गहन अध्ययन की छाप छोड़नी शुरू की ,संस्कृत और हिन्दी तो उसके अधिकार में थी ही | कठिन प्रयास और प्रभु की कृपा से वह विशुद्ध अंग्रेजी में धाराप्रवाह और सारगर्भित बातचीत करने में समर्थ हो गयी | अब I.A.S. में उसका अन्तिम प्रयास था | कहते हैं प्रकृति की शक्तियां उसी का साथ देती हैं जो अपने लिये ठोस उन्नति की जमीन तैय्यार करता है | अन्तिम प्रयास में राधाचरण की पुत्री ने सफलता प्राप्त कर ली यद्यपि उसे I.A.S. से अलग हटकर I.P.S. में चयनित किया गया | राधाचरण की पुत्री ज्योत्स्ना ने सोचा कि I.P .S.ज्वाइन करनें के स्थान पर क्यों न डाक्ट्रेट करके यूनिवर्सिटी की सर्विस ज्वाइन की जाय पर पिता का आग्रह था कि वे उसे भारतीय पुलिस सेवा में ही देखना चाहते हैं | पिता के आग्रह और माता की अनुमति से ज्योत्स्ना नें I.P.S. का करियर स्वीकार कर लिया | राधाचरण ने अपने मित्र को सूचित करते हुये सिलीकान वैली में लगे उनके पुत्र के प्रगति सोपानों के विषय में पूंछ -तांछ की | श्यामा नें बताया कि अब वह कम्पनी का डिप्टी सी ० ओ ० बन गया है और उसे 50 लाख वार्षिक का पैकेज मिला है | पर अबकी बार उन्होंने राधाचरण की पुत्री को वधू बनानें के प्रस्ताव पर मौन साधे रखा | राधाचरण नें ज्योत्स्ना को बताया कि उसके मित्र श्यामाचरण का पुत्र जो सिलीकान वैली में एक ऊंची कम्पनी में डिप्टी सी० ओ ० है क्या अच्छा जीवन साथी साबित हो सकेगा | ज्योत्स्ना ने संकोच के साथ और पूरी निर्भीकता से उत्तर दिया कि वह तपांशु से मिलने के बाद ही कोई फैसला दे सकेगी | राधा ने अपने मित्र श्यामा को यह बात बतायी तो श्यामाचरण ने कहा कि वह तपांशु से बात करंगें उसे घर आये लगभग दो वर्ष बीत गये हैं और वे उसे भारत आने का आग्रह करंगें | जब उसका आना सुनिश्चित हो जायेगा तब ज्योत्स्ना से मिला देने की युक्ति भी की जायेगी पर श्यामाचरण की वाणी में अब पहले जैसा उत्साह नहीं था | ऐसा लगता था कि वह अपनें पुत्र तपांशु के व्यक्तिगत जीवन से पूरी तरह परिचित नहीं हैं और पिता -पुत्र में सम्बन्धों का कुछ तनाव पैदा हो गया है | राधाचरण ने इसीबीच ज्योत्स्ना का डाटा इन्टरनेट पर डाल दिया | उनके मन में आशंका जग उठी थी कि सम्भवतः श्यामाचरण की योजना सिरे न चढ़ पायेगी | बहुत आना -कानी के बाद आखिर माता -पिता के अत्यन्त आग्रह पर तपांशु नें भारत आने की योजना बनायी | ट्रेनिंग के बाद ज्योत्स्ना की नियुक्ति उन्नाव में D.S.P . के पद पर हो गयी | श्यामाचरण जी तो उन्नाव के स्थायी निवासी बन ही गये थे | तपांशु जब एरोप्लेन से उतरा और उससे मिलनें को उत्सुक लखनऊ के एयरपोर्ट पर उसके माता -पिता गाड़ी लेकर पहुंचे तो उन्होंने पाया कि तपांशु के साथ एक अमेरिकन युवती भी है | तपांशु ने लपककर माता और पिता के पैर छुये और युवती से कहा कि ये मेरे पैरेन्ट्स हैं | युवती ने हाँथ बढ़ाकर पिताजी से हैण्ड सेक करना चाहा और बोली , " I am Stella Jones,Tapansu is my friend ." श्यामाचरण ने स्टेला के बढ़े हुये हाँथ को गिर जानें दिया | तपांशु की मां ने भी उसको आओ बेटी कहकर गाड़ी में बैठनें के लिये बोला | श्यामाचरण अंग्रेजी के अध्यापक थे और उन्हें Friend शब्द की सारी व्याख्यायें मालूम थीं | पर कौन सी व्याख्या स्टेला पर लागू होगी इसे वे तपांशु के मुख से सुनना चाहते थे | श्यामाचरण के द्वारा तपांशु के आने की सूचना राधाचरण के पास पहुँच चुकी थी और वे रायबरेली से चलकर अपनी D.S.P. बेटी के पास उन्नाव आ गए थे | अगले दिन सुबह ब्रेकफास्ट पर मिलने की बात तय हुयी थी पर स्टेला को साथ देखकर श्यामाचरण ने पूर्व निश्चित मुलाक़ात के समय को बदलनें का मन बना लिया | आखिर स्टेला की असलियत जानें बिना ज्योत्स्ना को कैसे बुला लिया जाय | तपांशु के पिता ने बताया कि स्टेला उसकी मित्र है पर अभी तक वे विवाह के बन्धन में नहीं बंधे हैं | एक दो साल वे मित्र बनकर रहेंगें और यदि सब ठीक -ठाक रहा तो शादी कर लेंगें | नहीं तो उनके रास्ते अलग -अलग होंगें पर वे मित्र बनें रहेंगें | उसने पिताजी से कहा वह ज्योत्स्ना को ब्रेक फास्ट पर बुला लें |उसकी और स्टेला की जान -पहचान हो जायेगी | शादी की बात पर अन्तिम निर्णय एकाध साल के बाद ही होगा | श्यामाचरण ने निः संकोच होकर अपने बेटे से पूछा क्या स्टेला के साथ उसका शारीरिक सम्बन्ध हो चुका है ? तो तपांशु ने संकोच भरे स्वर में कहा Yes Father !अमरीका में तो यह सामान्य बात है | शारीरिक सम्बन्ध और विवाह अलग -अलग बातें हैं | विवाह तो प्रापर्टी के उत्तराधिकारी को पाने के लिये किया जाता है | शारीरिक सम्बन्ध का अपना एक निराला Moral कोड है कोई बाध्यता नहीं पर यदि मन में लहर उठी तो वर्जना का कोई अर्थ नहीं | भारत की संस्कृति इसे स्वीकार नहीं करेगी | पर अब मैं अमरीका का नागरिक हूँ और मुझे उसी संस्कृति में जीना है | ज्योत्स्ना मेरी तरफ से स्वतन्त्र है | पर क्या पता भविष्य में मैं उसकी दोस्ती के लिये प्रतीक्षा रत हो जाऊँ | श्यामाचरण ने सब सुना | तपांशु की माताजी से बात की | सारी रात दोनों सोचते -विचारते रहे | आखिरकार तपांशु की मां ने एक कठोर फैसला ले ही लिया उसने अपने पति से कहा कि वह भारत की नारी है और यदि उसका बेटा अमरीका की संस्कृति में रचना -बसना चाहता है तो उसे वह किसी मजबूरी में नहीं बांधेगी | ज्योत्स्ना के लिये न जानें कितनें जीवन साथी स्वप्न संजोये हुये हैं | वह सुन्दरी है | आफीसर है ,और भारत की एक नारी रत्न है | मैं अपने बेटे से अधिक उसे अपने नजदीक मानती हूँ | अब श्यामाचरण जी ने कहा तो मैं राधे को क्या बोलूं वह D.S..P.के बंगले पर सुबह 6 बजे मेरे फोन का इन्तजार करेगा | तपांशु की मां ने कहा घबराते क्यों हो ? कुछ अधिक नहीं कहना है | ,सिर्फ यह कह दो मैं आखिरी बाजी हार गया हूँ | राधाचरण तुम्हारी जीत भारत की जीत है | मैं और मेरी पत्नी तुम्हारी बेटी की योग्यता ,शालीनता ,और सरलता के लिये सदैव तुम्हारे कृतज्ञ रहेंगें | श्यामाचरण ने फिर हंसकर फोन पर कहा अरे यार मैं कहता था न कि आखिरी बाजी तेरे हाँथ में जायेगी | मेरी पराजय में ही ज्योत्स्ना की विजय है | अच्छा प्रणाम |

30/04/2020

इतिहास के पन्नों से

डेरियस थर्ड की विशाल सेना सिकन्दर महान के सामरिक कौशल के आगे पस्त -हिम्मत हो गयी। परशियन सेना के हजारों सैनिक काट दिये गये। भगदड़ मच गयी। डेरियस थर्ड युद्ध क्षेत्र छोड़कर अपने रथ से भाग खड़ा हुआ। पहले युद्ध में भी वह भाग चुका था और फिर दोबारा सेना एकत्र कर वह सिकंदारसे लड़ने आया था। इस बार भी वह भग कर बच निकलना चाहता था पर अब उसकी सेना के अपने सिपह सालारों नें ही उसे काटकर फेक दिया। फारस का साम्राज्य मैसेडोनिया के साम्राज्य का एक हिस्सा बन गया। हिन्दुस्तान के पश्चिमोत्तर सीमा के कुछ इलाके परसियन साम्राज्य के कुछ हिस्सा थे। इन इलाकों से परसियन साम्राज्य को बहुत बड़ा कर और सेना के लिये लड़ाकू जवान मिल जाया करते थे। अब ये सब सिकन्दर के अधिकार में आ गया था। लगभग एक वर्ष तक सिकन्दर महान नें इन सीमान्त इलाकों में शान्ति और व्यवस्था कायम करने में लगाया। और फिर हिन्दुकुश को पार कर उसने झेलम के बीच छोटे -मोटे राज्यों को रौंद डाला। अब उसका मुकाबला पोरस (पर्वत राज ) से होना था। जिसकी वीरता की गाथायें उसे तक्षशिला से ही सुनने को मिलने लगीं थीं। आभ्भीक की विजय के बाद अग्रिम क्षेत्र में भेजे गये उसके जासूसों नें लौट कर उसे बताया था कि वितस्ता के पार का राजा पोरस एक बहादुर राजा है। और वह कद -काठी में भी असाधारण है। यह दूसरी बात है कि वह सिकन्दर से उम्र में काफी बड़ा है पर देखने में वह पुरुषों में राजा ही दिखायी पड़ता है। सिकन्दर महान को जासूसों की इस सूचना नें और अधिक उत्तेजित कर दिया। उसने आज तक कभी पराजय का मुँह ही नहीं देखा था और उसे आज तक अपने बराबर का कोई योद्धा भी नहीं मिला था। सिकन्दर उस क्षण की प्रतीक्षा करने लगा जब पोरस से आमना -सामना हो जाय। सुकरात के शिष्य अफलातून (प्लेटो ) और अफलातून के शिष्य अरस्तू न केवल यूनान में बल्कि उस समय की सभ्य कही जाने वाली हर सभ्यता में अपने ज्ञान की अपार विशालता के कारण चर्चित हो रहे थे। अरस्तू का शिष्य सिकन्दर महान उनकी शिक्षा पाकर अपराजेय विजेता बन चुका था। धरती का एक बहुत बड़ा भू -भाग उसके साम्राज्य में शामिल कर लिया गया था। सिकन्दर की सेना लड़ते -लड़ते थक गयी थी और स्वदेश वापसी के लिये आतुर थी पर सिकन्दर था जो विश्वविजेता बनने का सपना पाल रहा था और भारत की विजय इस सपने का सबसे सुनहरा पक्ष थी। इधर भारतवर्ष में तक्षशिला विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र का एक अध्यापक विष्णु गुप्त चाणक्य भारत विजय का सपना पाले आगे बढ़ते हुये यूनानी विजेताओं को भारत की अदम्य शक्ति का परिचय देने के लिये एक योजना बना रहा था। यूनानी आक्रमण के समय वह तक्षशिला से दूर मगध के पाटिलपुत्र में जा बैठा था और वहां एक अत्यन्त प्रतिभा संपन्न नवयुवक को दीक्षित कर रहा था क्योंकि उस नवयुवक के द्वारा ही उसे भारत का एक चमकता हुआ स्वर्णिम इतिहास रचना था। सच पूंछो तो यह लड़ाई अरस्तू की शिक्षा -दीक्षा में पले अलक्षेन्द्र और चाणक्य की शिक्षा -दीक्षा में पले चन्द्रगुप्त में होनी थी। पर पोरस विजय के बाद सिकन्दर सेना के दबाव में और सेना नायकों की भयातुरता के कारण वापसी पर चल पड़ा। उसका मगध अभियान पूरा ही नहीं हो सका और इसलिये लगभग उसकी मृत्यु के ७ वर्ष बाद चन्द्रगुप्त को वैक्ट्रिया के सम्राट सिल्यूकस निकेटर से टकराना पड़ा। वैक्ट्रिया का राज्य पहले परसियन साम्राज्य का एक हिस्सा था और अब मैसेडोनियम साम्राज्य का एक हिस्सा बन गया था। सिल्यूकस सिकन्दर के प्रतिनिधि के रूप में सत्ता अधिकार का उपयोग कर रहा था। भारतीय प्राचीन इतिहास के सामान्य विद्यार्थी भी यह जानते हैं कि पोरस की सेना की पराजय उसकी कायरता के कारण नहीं वरन सैन्य संचालन में हाथियों और अश्श्वों की भूमिका के कारण हुयी थी। एक महाकाय हस्ती पर हौदे में बैठा पोरस आतंकित अवश्य कर रहा था पर उसका हाथी सिकन्दर के चपल अश्व के खुराग्रों से विचलित होकर मुड़कर भागने को हुआ। महावत के सारे प्रयासों के बावजूद जब हाथी का सधना सम्भव न हुआ और हाथियों की पूरी कतार उलट कर दौड़ने में अपनी ही फ़ौज को कुचलने लगी तो पोरस हौदे से कून्दकर कृपाण हाथ में लिये हौदे से नीचे कूंद पडा। उसकी पुष्ठ लम्बी काया और उसका रोबीला चेहरा तथा जोश में आकर यूनानी सेना के सैनिकों के बीसों कटे सिर उसके अद्वितीय वीर होने के गवाही थे। दूर खडा सिकन्दर यह सब देख रहा था घोड़ा बढ़ाकर जब तक वह पोरस के नजदीक आया तब तक पोरस सकडों यूनानी सैनिकों के बीच घेर लिया गया था। उसकी तलवार टूट चुकी थी और केवल मुठ्ठी उसके हाथ में थी फिर भी कोई यूनानी सैनिक उसके आस -पास पांच छह फीट के घेरे में आने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। अलक्षेन्द्र नें यह सब देखा, सैनिको को चीरता हुआ बीच में आया और अपने अश्व पर से ही उल्टी तलवार की मूठ से पोरस के हाँथ में बंधी तलवार की टूटी मूठ को झटका देकर नीचे गिरा दिया फिर घोड़े से नीचे कूंदकर पोरस के सामने खड़ा हो गया। विशाल काया वाले युद्ध भूमि के अप्रतिम सेनानी दो महानायक आमने -सामने खड़े थे। पोरस यूनानी सैनिकों से घिरा था पर सिकन्दर नें हाँथ उठाकर आघात करने से रोक दिया था। युद्ध भूमि में ही द्विभाषिये को बुलाया गया जो यूनानी भाषा को सिन्धी भाषा में अनूदित कर सकता हो। प्रशंसा भरे नेत्रों से पोरस को देखते हुए महान अलक्षेन्द्र नें प्रश्न किया पर्वतराज आपके साथ कैसा व्यवहार किया जाये ? निडर ,निशंक पोरस नें सिर ऊँचा करके कहा महान विजेता अलक्षेन्द्र से हमें उसी व्यवहार की आशा है जो एक राजा दूसरे राजा के साथ या एक अपराजित योद्धा दूसरे अपराजित योद्धा के साथ करता है। इस उत्तर को सुनकर अलक्षेन्द्र के मन में प्रशंसा का भाव उमड़ पड़ा। निश्चय ही पोरस सच्चा वीर है। आत्म विश्वास से परिपूर्ण एक आदर्श राजा। अलक्षेन्द्र नें फिर कहा पर्वत राज बराबरी का व्यवहार तो तुम्हे मिलेगा ही पर अलक्षेन्द्र से तुम और भी जो चाहो पा सकते हो। मेरे उस्ताद अरस्तू ने ठीक ही कहा था कि सच्चे वीर तो भारत में ही देखने को मिलते हैं। पोरस नें कहा देवपुत्र अलक्षेन्द्र मैंने राजा से राजा जैसे व्यवहार की बात कही है और मेरे इस वाक्य में ही सब कुछ माँगना शामिल हो जाता है ।

अलक्षेन्द्र नें खिलखिलाकर पर्वतराज की ओर मैत्री का हाँथ बढाया ,विश्व के इतिहास में इन दो मित्रों के ,विश्वाश ,सहयोग और पारस्परिक आदर का जो लेखा -जोखा मिलता है उससे अधिक रोमांचक और प्रभावशाली वीरत्व की गाथा और कहीं सुनने पढने को नहीं मिल सकती। भारत में सिकन्दर द्वारा जीते हुये सभी भू भाग पोरस के राज्य में मिला दिये गये और पोरस को उनके स्वतन्त्र प्रशासन का अधिकार सौंप दिया गया। यदि सिन्धु पार कर महान अलक्षेन्द्र पूर्व की ओर बढ़ता तो भारत का प्राचीन इतिहास कौन सा मोड़ लेता यह कहना अत्यन्त कठिन है। सिकन्दर की सेना का वापस लौटना और वापसी में होने वाले युद्धों की भयानकता और फिर उसके कुछ वर्षों बाद उसकी मृत्यू सभी का विस्तृत विवरण यूनानी इतिहासकारों के पन्नों में सुरक्षित है। और उन पन्नों में यह भी लिखा पाया जाता है कि सिकन्दर की मृत्यू का सबसे बड़ा दुःख उसके भारतीय मित्र पोरस को हुआ। जिसके आघात से वह कभी उबर नहीं सका।

अलक्षेन्द्र महान और उसके उस्ताद अरिस्टोटल दोनों ही विश्व इतिहास के अमर पुरुष हैं। रण विशारदों का यह मत है कि इतिहास पूर्व के मिथिकों .महाकाब्यों और पौराणिक वृतान्तों को यदि हम अलग कर दें तो मानव जाति के लिखित इतिहास में मैसेडोनिया के शासक फिलिप के पुत्र अलक्षेन्द्र महान से बड़ा कोई योद्धा धरती पर अवतरित नहीं हुआ है। न केवल व्यक्तिगत शूरता और विजेता होने पर भी विजित के प्रति मानवीय भाव बल्कि व्यूह रचना और सैन्य संचालन की तकनीक इन सभी में अलक्षेन्द्र विश्व का अजेय महानायक बनकर चर्चित हुआ है। और अलक्षेन्द्र के उस्ताद अरिस्टोटल जिन्हें भारतीय अरस्तू के नाम से जानते हैं अपनी बहुमुखी विद्वता के लिये संसार के महानतम ज्ञानियों में शीर्ष स्थान के अधिकारी हैं । दर्शन ,विज्ञान ,समाजशास्त्र ,न्याय व्यवस्था ललित कला और व्यक्तित्व निर्माण कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसमें अरस्तू नें कोई अमिट छाप न छोड़ी हो पर जिन दिनों यूनान में अरस्तू के ज्ञान का डंका बज रहा था उन्ही दिनों भारत में घनी खुली चोटी लिए एक श्याम वर्णी ब्राम्हण एक विशाल भारतीय साम्राज्य की स्थापना के सुद्रढ़ आधार स्तंभ्भ जुटाने में लगा था। यूनान की टक्कर में भारत कुछ देर के लिये भले ही पराभूत होता दिखायी पडा हो पर विश्व्गुप्त चाणक्य की आँखें एक दशक के बाद आने वाले उस युग को देख रहीं थीं जब भारत की सीमायें मगध के पूर्वी सीमान्त पहाड़ियों से लेकर वैक्ट्रिया को घेरते हुये अफगानिस्तान तक पहुँच जायेंगीं। चन्द्रगुप्त का प्रशिक्षण पूरा होने को था और विलक्षण विश्व गुप्त मगध में उथल -पुथल के बीज बो रहा था। आर्य और अनार्य ,लौकिक और अलौकिक ,गगन और धरित्री ,वीर और भूमा इन सभी के आदर्श मिलन नें विश्व गुप्त की चिन्तना को गढ़ा था। कर्मयोगी चाणक्य का शिष्य चन्द्रगुप्त अरस्तू की विश्व व्यापी ख्याति को चुनौती देकर ज्ञान विज्ञान में पाये उनके शीर्ष पद को भारत के लिये सुरक्षित करवा रहा था और ऐसा ही हुआ भी। सिकन्दर की मृत्यु के ७ वर्ष बाद ही उसका विशाल साम्राज्य वायु की लहरियों पर बीते गये कल का स्वर बनकर लहराने लगा। उसके साम्राज्य के भारत के पश्चिमी सीमान्त से मिले मध्य पश्चिम एशिया के सभी भू भाग मौर्य साम्राज्य में चाणक्य की कूटिनीति से सन्चालित चन्द्र गुप्त की तलवार के बल पर छीन लिये गये। काबुल ,कन्धार ,तक्षशिला में सिकन्दर के साथ आयी कला ,साहित्य और रण कौशल की विचार धारायें और तकनीकें पाटिलपुत्र से आयी हुयी भारतीय चिन्तन और तकनीकों से मिलकर कालजयी श्रष्टियाँ करने लगीं। १३७ वर्ष तक चलने वाला विशाल मौर्य साम्राज्य जिसने अशोक महान जैसे विश्व इतिहास के महानायक को जन्म दिया भारत के अतीत की सबसे गौरवमयी गाथा है।

29/04/2020

करो या मारो

हाँ तुम्हें मुझ पर हंसने का पूरा हक़ है

चाहो तो मुझसे घृणा कर सकते हो

या ----या मुझ पर तरस खा सकते हो

मैनें तुम्हें बुद्ध ,ईसा और गान्धी के

आदर्शों पर चलनें को कहा

मैनें तुम्हें सत्य ,त्याग और ईमानदारी के

पाठ पढ़ाये

मैनें तुम्हें छल -छद्म और हेरा फेरी से

दूर रहने का आदेश दिया

और तुमनें मेरे उपदेशों को सुना

उन पर चले और आज तुम युवक हो

निर्भीक ,ईमानदार ,कर्तब्यनिष्ठ |

पर तुम भूखे हो ,बेकार हो और

अपने चारो ओर सीखे हुये आदर्शों की

लाशें देख रहे हो

हर मोड़ पर ईशा शूली पर टंगा है ,हर

गली में गांधी को गोली मारी जा रही है

तुम तिलमिला रहे हो मेरी ओर

प्रश्न सूचक द्रष्टि से देख रहे हो ----

तुम्हारी योग्यता सिफारिश के आगे बेकार है

तुम्हारा सद्चरित्र ही तुम्हारा दुर्गुण बन गया है

तुम्हारी ईमानदारी ही तुम्हारे मार्ग का रोड़ा है ---

हे भगवान् ! मैं तुम्हारी प्रश्न- सूचक

द्रष्टि का क्या उत्तर दूँ ---

क्या फिर वही आदर्श दोहराऊँ जिनकी

लाश पर मैं स्वयं खड़ा हूँ

नहीं ,मैं तुम्हारी निष्क्रिय बलि नहीं लूंगा

तुम स्वतन्त्र हो मुझ पर हंसने के लिये

मुझसे घृणा करने के लिये

पर यदि तुम्हारे यौवन में चुनौती स्वीकार

करनें की शक्ति हो तो इतना करो

जो सत्ता अनाचार और अतिचार

को पाल रही है उसे एक हथौड़े का प्रहार तो दो ---

कर्म की तरी पर डूबो या तरो

करो या मरो |

27/04/2020

आंग्ल भाषा का यह त्रिशब्दी कथन " Knowledge is power" आज के युग में जितना सार्थक है उतना शायद मानव इतिहास के किसी काल में नहीं रहा है। ज्ञान -विज्ञान के अभूतपूर्व प्रचार -प्रसार के कारण ज्ञान -विज्ञान का साहित्य अब अध्ययन -अध्यापन की द्रष्टि से प्राथमिकता पा चुका है। ललित साहित्य अब बहुत कुछ फिल्मों ,टी .वी .,शोज ,ग्लैमर ,एडवरटाइजमेन्ट्स और हल्के -फुल्के हास -परिहास की क्षणिकाओं में सिमटता जा रहा है। मेरा मानना है कि ललित साहित्य और ज्ञान -विज्ञान के साहित्य के बीच कोई ऐसी विभाजक रेखा नहीं होनी चाहिये जो दोनों को एक दूसरे से अलग कर दे। ललित साहित्य का सहारा लेकर ज्ञान -विज्ञान भारत के घर -घर ,गाँव -गाँव ,में अपनी पहुच बना सकता है। शुष्क तथ्यों को और जटिल सूत्रों को नीरसता का बोझ दबा देता है और वे सहज स्वीकृत नहीं पाते। आवश्यकता है ज्ञान -विज्ञान के ऐसे समर्थ अधिकारी विद्वानों की जो बोध -गम्य भाषा के द्वारा उदाहरणों , किस्सा -कहानियों और भारतीय परम्परागत धार्मिक विचारधाराओं से आज की नयी खोजों और विश्व स्वीकृत मूल्यों को जन मानस तक पंहुचा सके। मुझे लगता है कि विज्ञान को बालकों और किशोरों में मनोरंजक ढंग से पहुचाने के लिये विज्ञान की धारणाओं पर आधारित ललित साहित्य के सृजन की बहुत अधिक आवश्यकता है। इसे एक राष्ट्रीय चुनौती के रूप में स्वीकार करना होगा। पश्चिम के देशों में तथा जापान और चीन में भी विज्ञान पर आधारित प्रचुर ललित सामग्री उपलब्ध है पर हिन्दी भाषा में इस दिशा में समर्थ प्रयास देखने को नहीं मिल रहे हैं। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हिन्दी भाषा- भाषी क्षेत्र में वैज्ञानिक सोच अभी जीवन के सहज धरातल पर उतर कर व्यवहार के रूप में नहीं ढल पायी है। कोई भी ज्ञान जब तक हमारी सोच का अविभाज्य अंग नहीं बनता तब तक उसे ललित साहित्य के माध्यम से व्यक्त करना काफी दुष्कर होता है।रोबोट को लेकर लिखी जाने वाली कहानियाँ ,वार्तायें और नाटकीय रचनायें प्राणवान नहीं बन पाती क्योंकि रोबोट का किताबी ज्ञान हमारे सामान्य व्यवहार में कहीं परिलक्षित नहीं होता। ऐसा इसलिये भी है क्योंकि अभी हम अत्याधुनिक वैज्ञानिक सुविधाओं से अपरिचित ही हैं।परिचय है भी तो केवल सतही किताबों ,द्रश्य चित्रों और अधकचरी चर्चाओं के माध्यम से। रोबोट की कौन कहे अधकांश हिन्दी भाषा -भाषी क्षेत्र के समर्थ शब्दकार अभी तक Email,Internet,और broad Band जैसी आधुनिक संचार प्रणाली के सामान्य ज्ञान से भी वंचित हैं। इस दिशा में घर -घर तक दूर संचार प्रणाली के साधनों को पहुचाने का भारत सरकार का प्रयास निश्चय ही सराहनीय है। समाजशास्त्र के अध्येता आज एक स्वर से यह कहते सुने जाते हैं कि मानव की सोच उसके आस -पास के वातावरण और उसकी व्यक्तिगत तथा उसके समाज की साझा परिस्थितियों से बनती -बिगड़ती है। मनुष्य की सोच शून्य से गिरने वाला कोई ऐसा फल नहीं है जो उसे एकान्त में मिल जाय। Technocracy के आज के युग में हमें अपनी प्राचीन पूजा पद्धतियों को भी नवीन भेष -भूषा से सजा -बजा कर प्रस्तुत करना पड़ रहा है। महेश योगी . रवि शंकर , स्वामी रामदेव ,बापू आशाराम तथा भगवान अघोरेश्वर सभी अपनी साधना पद्धतियों को वैज्ञानिक आधार देने में प्रयासरत हैं और इसमें उन्हें काफी सफलता मिली है । पाश्चात्य जगत भी उनकी खोजों के प्रति आश्वस्त दिखाई पड़ रहा है । अब गुफाओं के स्थान पर योग साधना के लिये Air Conditioned हाल चुने जाने लगे हैं ।और वन्य प्रान्तरों का एकान्त Hill Resorts में बदल चुका है।शरीर की सन्चालन प्रक्रिया के नाप -तौल के लिये हमनें आधुनिक मेडिकल इंस्ट्रूमेंट्स को अपना लिया है और ऐसा करना उचित भी है क्योकि विकास की गति सत्य -प्राप्ति की नवीन खोजों को स्वीकार कर लेने से ही संम्भव होती है । वैज्ञानिक चिन्तन हमारे रहन -सहन , खान -पान , रीति -रिवाज़ , उत्साह -समारोह और हमारी जीवन -म्रत्त्यु सम्बन्धी धारणाओं पर भी एक कल्याणकारी नजर डालनें में समर्थ है। बिना गहराई से जाँच किये सभी कुछ स्वीकार कर लेना हानिकारक हो सकता है पर बिना गहराई जाँच किये बहकावे में आकर किसी अच्छी प्रथा को छोड़ देना भी हानिकारक हो सकता है।इसलिए प्रज्ञा युक्त तर्क और संशोधन के लिए सहज मनोवृत्ति बनाकर ही हम अपनी परम्पराओं की उपादेयता की पहचान कर सकते हैं। जिस प्रकार सोच आकाश से नहीं गिरती वैसे ही परम्परायें भी किसी ईश्वरीय विधि -विधान से बनकर नहीं आतीं। विश्व के सभी श्रेष्ठ समाजशास्त्री आज इस बात पर सहमत हैं कि बीते कल में किसी मानव समाज के लिए जो उपयोगी था वह आज हानिकारक भी हो सकता है। प्रथाएँ , मान्यताएँ ,परम्परायें और यहाँ तक कि नैतिक अवधारणायें भी बहुत कुछ समय की दें होती हैं। सहस्त्रों वर्षों की विकास प्रक्रिया में मानव सभ्यता न जाने कितने टेढ़े -मेढ़े मार्गों से गुजर कर आयी है। हजारों लाखों मनुष्यों की नर -वालियाँ , हजारों लाखों नारियों का शरीर शोषण और हजारों लाखों धर्म मन्दिरों और संस्कृति स्मारकों का तहश -नहश मानव इतिहास का एक दुखद पहलू रहा है। इतिहास के अध्येता जानते हैं कि उजले पखवारे अधिक समय तक नहीं टिक पाये जबकि अन्धेरे का राज्य अटूट रूप से चलता रहा है। इस प्रकार की व्यवस्था में विशिष्ट भैगोलिक परिस्थितयों में और अपने समय के ऐतिहासिक सन्दर्भों में जीवन ,सम्पत्ति और मर्यादा की रक्षा के लिए नये -नये नीति विधान बनाये गए। अनेक आचरण पद्धतियाँ विकसित की गयीं और नर -नारी सम्बन्धों को नयी -नयी व्याख्याओं में प्रस्तुत किया गया। यह ठीक है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद अभी तक युद्ध की विश्व व्यापी विभीषका से हम बचे हुए हैं पर छोटे -मोटे पचासों युद्ध तो दुनिया में होते ही रहें हैंऔर होते ही रहेंगे। भारत विभाजन की विभीषका नें लाखों पंजाबी घरों में नयी सोच का संचार किया क्योंकि अपनी प्रगति और स्थापना के लिए नए सामाजिक सम्बन्धों की आवश्यकता थी।लाखों भारतीय आज योरोप ,अमेरिका और विश्व के अन्य देशों में जाकर बस कर अपनी सोच में परिवर्तन लाने की आवश्यकता को माननें पर विवश हो रहे हैं।जैसे -जैसे हिन्दी भाषा -भाषी समाज में आर्थिक प्रगति का विस्तार होगा और जैसे -जैसे टेक्नोलाजी पर आधारित उनकी जीवन शैली विकसित होगी उनकी रचना धर्मिता में परिवर्तन आना प्रारम्भ हो जायेगा। हम अपने पुराने और श्रेष्ठ रचनाकारों का आदर करेंगे और अपने समय के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में लिखे गए उनके साहित्य के मूल्यों का सही आंकलन करेंगें पर हमें अपनी पीढ़ी और अपने युग के लिए नए मूल्यों की तलाश भी करनी होगी।किसी युग में बहु पत्नी प्रथा शायद समाज के लिये कल्याणकारी रही हो पर आज तो निश्चय ही यह विनाशकारी है। किसी युग में अबाध वंश ब्रद्धि शायद कल्याणकारी रही हो पर आज तो यह निश्चय ही वांछनीय नहीं है । किसी युग में छुआ -छूत की प्रथा शायद सामाजिक सन्दर्भों में सार्थक रही हो पर आज तो वह निरर्थक बोझ ही है। किसी युग में अंग्रेजी का ज्ञान पश्चमी दासता का सूचक रहा हो पर आज तो वह निश्चय ही ज्ञान -विज्ञान की प्रगति के लिए आवश्यक है। ऐसी ही अनेक धारणायें और मान्यतायें परिवर्तन की मांग करती हैं। अनावश्यक पशु बलि , अपढ़ ओझाओं और तान्त्रिकों में अन्ध विश्वास , प्रकृति के स्वाभाविक कार्यक्रम से होने वाले परिवर्तनों को किसी विशिष्ट मानव समूह के कर्मों का फल बताना यह सभी बातें वैज्ञानिक चिन्तन पर ही अपना खरा -खोटापन साबित कर सकती हैं। पुरातन संस्कृति को भी नयी शक्ति पाने के लिये नये आसवों की आवश्यकता है। माटी नूतन और पुरातन का आदर्श समन्वय चाहती है। घर के बड़े -बूढ़े विवेक पूर्ण मार्गदर्शन करते रहें और उनके बताये राह पर ओज भरी तरुणाई चलती रहे तभी किसी गृह का संचालन सफल माना जाता है। हन्दी भाषा -भाषी क्षेत्रों के लिये भी अपने प्राचीन और कालजयी मूल्यों की अगुवाई में नवीन नैतिक अवधारणाओं को शामिल करना होगा तभी निकट भविष्य में प्रगति की गाथा लिखी जाने लायक सफलता मिल सकेगी। हजारों वर्षों के लम्बे इतिहास में लाखों वर्ग मील फैले भारतीय महाद्वीप में बहुत कुछ ऐसा भी है जो शायद अब निरर्थक हो गया है। हम उसे बटोर कर एक कोने में रख देंगे। जो नयी विचार सामग्री हमें आज जीवन यापन के लिये आवश्यक लग रही है उसे हम स्वीकार कर एकत्रित करेंगें। पर समय परिवर्तन शील है। कोने में बटोर कर रखे हुये साज सामान में से कौन सी चीज कल हमारे काम आ जाये ऐसा ध्यान भी हमें रखना होगा। इसी प्रकार आज के सहेजे मूल्यों में आने वाले दिनों में कौन सा मूल्य निरर्थक हो जाय ऐसा मानने के लिए भी हमें तैयार रहना होगा।
यूनानी साहित्य की बहुचर्चित गाथाओं में सिसीफस की कहानी से आप परिचित ही होंगे।सिसीफस पहाड़ की चोटी पर बार -बार पत्थर के एक विशाल टुकड़े को गोलाकार बनाकर टिकाना चाहता था। आकार देनें में तो उसे सफलता मिल जाती थी पर ज्यों ही वह गोलाकार विशाल प्रस्तर की निर्मित चोटी पर टिकाता वह वर्तुल आकार लुढककर नीचे पहुँच जाता । जीवन भर सिसीफस इस कठिन कार्य में लगा रहा पर हर बार उसका यह प्रयास लुढ़कन की राहों से चलकर तलहटी पर पहुँच गया। आज के युग में सिसीफस को विशालकाय वर्तुल प्रस्तर खण्ड को टेक्नोलोजी की मदद से उत्तुंग शिखर पर टिका देने की सफलता मिल जाती। बीते कल की कल्पना उड़ाने आज का ठोस सत्य बन रही हैं। माटी ईश्वर की अपार कृपा में विश्वाश रखती है और माटी परिवार प्रभु से माँगता है कि उसके द्वारा तराशी गयी शब्द आकृतियाँ आदर्श की ऊँचाइयों पर स्थायी रूप से टिकी रहें।'माटी परिवार 'सम्पूर्ण हिन्दी भाषा -भाषी क्षेत्र को अपनी बाहों में समेट ले

26/04/2020

नचिकेता धर्मराज की ड्योढ़ी पर
प्रष्ठभूमि :- लक्ष मुखी यज्ञ पूर्णाहुति के पश्चात भूमण्डलेश्वर वज्र्श्ववा अपना सर्वस्व दान करने में लगे हैं। कंचन ,रजत ,आभूषण ,वस्त्र ,दुधारू तथा स्वस्थ पशु दान में दिये जा चुके हैं। विप्रों की एक कतार अभी भी कुछ पाने को उत्सुक है। अब क्या दिया जाय ?बूढ़े निर्बल पशु ,बाँझ गायें और मृत्तिका पात्र के अतरिक्त शेष ही क्या है?
नचिकेता कथन :-अपने पिता भूमण्डलेश्वर वज्रश्ववा को नचिकेता का प्रणाम स्वीकृत हो। महाराज ,इन निरीहमरणोन्मुख पशुओं के दान से क्या लाभ। बाँझ धेनुयें तो पाने वालो के लिये बोझा बन जायेंगी। मृत्तिका पात्र तो ले जाने में ही टूट -फूट जायेंगे। आप तो अद्वतीय दानी हैं। दान का महत्त्व तो अपनी सबसे प्यारी वस्तु को दान करने में होता है। यदि वस्तुयें न रहें तो अपने प्रियजनों का दान भी दिया जा सकता है।
वज्रश्ववा :- नचिकेता तुमने अभी -अभी कैश्योर्य छोड़ा है। तुम अभी दान की गहरी बातो को नहीं समझ पाये हो जो कुछ भी अपना है जिस किसी भी चीज में लगाव है उसका सहज भाव से दान करना और उसके वियोग में बिना तरंगायित हुये स्थिर रहना ही दानी की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।
नचिकेता :- महाराज मैं आपका पुत्र हूँ और आप सदैव कहा करते हैं कि आप मुझे संसार की सभी वस्तुओं और प्राणियों से अधिक प्यार करते हैं। फिर आप मुझे दान में क्यों नहीं देते। बोलिये मुझे किसे दान में देंगें -उकडू स्वामी को या अकडू स्वामी को ?
वज्रश्ववा :- नचिकेता तुमनें अभी मौन का महत्त्व नहीं जाना है। देखता नहीं लेने वालों की पंक्ति में छपड़क जी और फनफड़ जी दोनों ही खड़े हैं। तेरी बड़ -बड़ के कारण वे कहीं तुझे ही न मांग लें।
नचिकेता :- जन्मदाता आप मुझे किसी योग्य पात्र को दीजिये। देना तो पड़ेगा ही । मेरे दान के बिना आपका यज्ञ सम्पूर्ण ही नहीं होगा बोलिये मुझे किसको देते हैं। चुप क्यों हैं -बोलिये न मोह आपको शोभा नहीं देता।
वज्रश्ववा :- (उत्तेजित स्वर में )अच्छा ! तू जिद्द पर अड़ा है। जा मैं तुझे यमराज को दान में देता हूँ।
नचिकेता :- आप धन्य हैं पिताजी। आपने मेरे लिये सर्वथा मोह का त्याग कर दिया। आह ! यम लोक के प्रस्थान के लिये कितनी बड़ी आत्मिक शक्ति आपने मुझे प्रदान कर दी हैं। अब किसमें शक्ति है जो मुझे जाने से वहाँ रोक ले। (और आकाशगामी नचिकेता का शून्य धावन ,बिजली की कौंध .क्षणिक अन्धकार )
नचिकेता :- (स्वगत )आज तीन दिन बीत गये पर अभी तक धर्म अधिष्ठाता के दरबार से दर्शन का बुलावा नहीं आया लगता है महिष पर आरुढ़ होकर म्रत्त्यु देवता १४ लोकों के भ्रमण पर हैं। ( नेपथ्य में कुछ आवाजें आती हैं ) चित्रगुप्त धर्मराज से कहते हैं कि एक युवा ब्राम्हण मेरे बिना बुलाये ही यमलोक की ड्योढ़ी पर आपके दर्शन को खड़ा है। तीन दिन हो गये हैं। कहता है उसके पिता नें उसे यमदेव को दान में दे दिया है। अब उसके पास और कहीं जाने का विकल्प ही नहीं है।
यमराज :- ठीक है मैं भ्रमण पर था पर मुझे यदि बीच में सूचना मिल जाती तो मैं अपने महिष को और द्रुतगामी बनाकर पहले आ सकता था। चित्रगुप्त इन तत्व खोजी ब्राम्हणों का अपमान उचित नहीं होता। लोग बुलाने पर भी मेरे पास आने से कतराते हैं। क्या नाम बताया इसका ,चित्रगुप्त ? नचिकेता : आह बड़ा भब्य नाम है। इस नाम का यही अर्थ है न वो ब्राम्हण जो कभी याचना नहीं करता तभी तो उसे नचिकेता नाम दिया गया है। वह मुझसे मिलने की याचना कर रहा है। साधु -साधु । उसे आदर से बुलाकर मेरे पास लाओ। दो यमदूतों के साथ नचिकेता सर्पाकार आबनूसी सिंहासन पर बैठे हुये यमराज को प्रणाम करते हैं। नचिकेता का तरुण सुन्दर शरीर और उसका दीप्त भाल यमराज को प्रभावित करता है।
यमराज :- तुम्ही हो नचिकेता ? वत्स तुम तो अत्यन्त तेजस्वी लगते हो। इतनी कम उम्र में इतना अधिक साहस तीन दिन तक मेरी प्रतीक्षा में ड्योढ़ी पर बैठे रहे। मैं अत्यन्त प्रसन्न हुआ। हाँ एक दिन की प्रतीक्षा के लिये मैं तुम्हें एक -एक वर देता हूँ। तुम कोई तीन वर मुझसे मांग लो।
नचिकेता :- हे धर्म के अधिष्ठाता , मैं आपकी प्रसन्नता पा सका इससे अधिक मुझे और क्या चाहिये। जब मैंने आपकी ड्योढ़ी में माथा टिका दिया तो मुझे सांसारिक वरों की आवश्यकता ही नहीं रही। पर मैं आपसे तीन वरों के बदले में सिर्फ एक भिक्षा माँगता हूँ। आप मुझे म्रत्यु का रहस्य बता दीजिये। मरण और अमरण ,म्रत्यु और अमरत्व इनके बीच क्या अन्तर हैं। और म्रत्यु के अमिट विधान को नकार सकने का क्या कोई उपाय है।
यमराज :- वत्स तुम अभी बहुत छोटे हो। इन प्रश्नों का उत्तर पूछने के लिये तो तीन लोकों में भ्रमण करने वाले नारद जी भी मुझे मिले थे। कहते थे क्षीर सागर से शेष शायी लक्ष्मी पति नें उन्हें इन जिज्ञासाओं के समाधान के लिये मेरे पास भेजा है। पर मैंने यह कहकर टाल दिया कि इन प्रश्नों के उतर के लिये मुझे कई विभागों से सूचनायें और सुझाव इकठ्ठे करने होंगे। नारद जी कह गयें हैं कि वह मार्कण्डेय और अमरत्व प्राप्त शुकदेव तीनो मेरे पास मिलकर आयेंगे तब तक हम अपने सारे विभागों से राय मशविरा कर लूँ। वत्स तुम्हारी कच्ची उम्र तुम्हे यह ज्ञान पाने का अधिकार नहीं देती। हाँ तुम चाहो तो तुम्हे कन्चन के ढेर ,हस्ति झुण्डों का अधिकार या अश्व समूहों का निर्देशन सौंप सकता हूँ।
नचिकेता :- देव , मरण आपकी मुठ्ठी में है। और अमरत्व पाने की कुंजी आपके द्वारा प्रदान की जाने वाली दार्शनिक द्रष्टि में है । पिताजी द्वारा मैं आपको दे दिया गया हूँ। म्रत्यु के देवता यदि आप मुझे म्रत्यु के बन्धन से मुक्त करते हैं तो हमें अमरत्व की कुन्जी दीजिये।
यमराज :- अरे नचिकेता तू अभी युवा है ,शक्तिशाली है। संसार के सुख भोगने की पूरी क्षमतायें तेरे शरीर में क्रियाशील हैं। देख ऊपर नभ विहार की ओर देख। आकाश गंगा के बीच प्रकाश के झूलों पर झूलती अपार रूप की धनी अप्सरायें तुझे बुला रहीं हैं देख उनमें से कुछ वीणा के सुरों पर और कुछ कुम्भ हस्त चालन द्वारा तुझे अपने पास बुला रहीं हैं। बोल नचिकेता जायेगा मैं तुझे उनके बीच भेज देता हूँ।
नचिकेता :- हे कर्म फलों के निर्णायक मेरे हठ को क्षमा करना मुझे तो आत्मा और अमरत्व का ज्ञान ही चहिये। देह का कोई भी सुख मुझे अपनी ओर नहीं खीचता। मैं तो मन के प्रबल वेग को भी आत्म सयंमके द्वारा बाँधने के पक्ष में हूँ।
यमराज :- अच्छा नचिकेता मैं तुझे तेरे पिता के पास वापस भेज देता हूँ\ राज्य कर । धर्म का आचरण कर। सत्य का आचरण कर। संसार बसा। फिर जब म्रत्यु को प्राप्त होगे तब यमलोक में आना। उस समय तुम्हे आत्म ज्ञान पाने का अधिकार होगा।
नचिकेता :- भगवान अब तो मैं आपके पास आ ही गया हूँ।आपके पास आकर वापस जाना और फिर आपके पास आना तो एक उल्टी -सीधी प्रक्रिया है। आपके चरणों के पास बैठकर ही आपके बिना कहे ही मुझे सब कुछ समझ में आ जायेगा। भूमि पथों या तारापथों पर जहाँ भी आप जायेगे मैं आपके पीछे -पीछे चलता रहूँगा। (इतना कहकर नचिकेता यमराज के सिंहासन के पास स्थिर चित्त होकर बैठ जाता है। )
यमराज :- आँखे खोलो नचिकेता ,तुम्हे अब नये जीवन का प्रकाश मिल जयेगा। तुम अमरत्व की कुंजी पा सकोगे मैं तुम्हें आत्मा की रहस्य मयी शक्तियों के बारे में बताता हूँ। तुम सचमुच ही देह के बन्धन से मुक्त दिब्य चेतना से संपन्न एक सच्चे जिज्ञासु हो तुम आत्म ज्ञान के अधिकारी हो वत्स। ध्यान से सुनना। (यमराज उवाच )(कठोपनिषद का सार )
देखो नचिकेता ज्ञानी जन इन्द्रिय सुख और आत्म सुख का अन्तर जानते हैं। आनन्द और मनोरंजन इन दोनों में बहुत गहरा अंतर है। आनन्द आत्मा की पुलक भरी अनुभूति है जबकि मनोरंजन सुखेन्द्रियोँ की क्षणिक उत्तेजना है। नचिकेता तुम तो विश्व की कई भाषायें जानते हो इण्डो आर्यन भाषा समूह में एक भाषा अंग्रेजी भी है। उसकी भी शब्द राशि इतनी ही प्रचुर है जितनी संस्कृत की। अंग्रेजी के दो शब्द हैं एक है Happiness और एक है Pleasure दोनों में बड़ा अन्तर है। Happiness आत्मसंतोष और आत्मसुख की टिकाऊ आधारशिला पर खड़ा है। Pleasure मचलती हुई लहरियों की तरह चलायमान धरातल पर स्थित है पर नचिकेता आनन्द की भी कई कोटियाँ हैं। आनन्द से बढ़कर अति आनन्द से होते हुये जब हम परमानन्द पर पहुच जाते हैं तब हमें यह मानव देह निरर्थक ही लगने लगती है। आत्मा का उर्ध्वगामी विहंग उस समय ज्योतित पथ के पार श्रष्टा के चिर आनन्दित प्रकाश पुंज में उड़ जाने के लिये व्याकुल हो जाता है।
नचिकेता :- हे ज्ञान सागर जब आत्मा देह में अविस्थित है तो देह का सुख -दुःख भी तो आत्मा को प्रभावित करता होगा। आपके कथन से लगता है कि देह का गठन आत्मा के निवेश के लिये ही होता है। उसका अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। पर अबूझ पर्वत के ऊपर मेरे राज्य में कमर में बाघम्बर लपेटे एक मुनि मुझे मिले थे।उन्होंने मुझसे कहा थाकि देह और आत्मा के अलग -अलग होने की बातें शब्दों की काब्यात्मक उक्तियाँ हैं। सच पूछो तो देह के बिना तो आत्मा रह ही नहीं सकतीऔर फिर यदि आत्मा का स्वतन्त्र अस्तित्व है तो उसे कभी किसी ने देखा जाना क्यों नहीं। न तो किसी ने शरीर में उसका प्रवेश देखा है और न वहिर्गमन। कई बार मुझे मेरे कुल गुरु ने बताया है कि तपश्वी ऋषियों के सिर के ऊर्ध्व भाग से म्रत्त्यु के समय प्रकाश की एक लौ निकलती है और विद्दयुत कौंध के साथ गगन में विलीन हो जाती है। क्या ऐसा ही होता है। आप तो म्रत्यु के देवता हैं आपसे तो कुछ छिपा हुआ नहीं है । यमराज :- देखो वत्स ,मैं तुम्हारे समक्ष बैठा हूँ मेरा वाह्य शरीर तुम्हारे सामने है। यदि मैं साधारण मनुष्य होता और मै मृत्यु को प्राप्त होता तो मेरा यह शरीर तुम्हारे सामने ऐसे ही उपस्थित रहता पर इसकी चेतना लुप्त हो जाती। अब यदि चेतना जिसे हम आत्मा य परम तत्त्व का अणु अंश कहते हैं उसकी अपनी अलग सत्ता न होती तो शरीर निर्जीव कैसे होता ?जो ऐसा नहीं मानते उन्होंने सत्य को जाना ही नहीं है। देखो नचिकेता ,न तो तुम हाँथ हो, न आँख ,न मुख , न कान। त्वचा से ढका तुम्हारा यह अस्थियों का ढाँचा तो मात्र इस लिये खड़ा किया गया है कि इसमें परम हंस का निवास हो। यह प्रश्न अत्यंत गूढ है और इनके शाब्दिक उत्तर तब तक मन को नहीं छूते जब तक अपने अनुभव से सिद्ध पुरुषों के साथ रहकर कोई यह जान नहीं लेता कि आत्मा शारीरिक सुख -दुःख से ऊपर चिर आनन्द के सिंहासन पर बैठी है। नचिकेता जो कुछ भी इस संसार में हो रहा है अपने सतत कार्यक्रम के अनुसार होता है । मानव जाति का यह झूठा अंहकार कि उसके द्वारा विश्व के कार्य कलाप संचालित किये जा रहें हैं एक सुहावने भ्रम के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। नचिकेता जन्म और मृत्यु ,मिलन और वियोग ,श्रष्टि और विनाश ,सभी कुछ श्रष्टा की माया के बदलते हुये परिद्रश्य हैं । एक पटाक्षेप के बाद दूसरा द्रश्य और फिर दूसरे के बाद तीसरा इस प्रकार अनगिनत काल तक अनिगिनत द्रश्य चलते रहते हैं। जो आत्मा के अमरत्व में स्थिर हो जाता है उसके लिये इन द्रश्यों का कोई महत्त्व नहीं है।
नचिकेता :- प्रभु संसार में इतना वैभिन्य है और घटनाओं का इतना आश्चर्य जनक अम्बार है कि यह मानना कठिन हो जाता है कि यह सब माया के लुभावने रूप ही हैं। भिन्नता की अपनी भी तो कोई सच्चायी होनी चाहिये।
धर्मराज :- देखो नचिकेता जैसे पहाड़ी की चोटी पर गिरता हुआ पानी न जाने कितनी धारायें बन कर भिन्न -भिन्न रास्तों से तलहटी की ओर दौड़ने लगता है। वैसे ही लीलाधर एक ही केन्द्र से जगत के समस्त मायाजाल को संचालित कर रहा है। अज्ञानी अलग -अलग बहती हुई धाराओं के अलग -अलग नाम देते हैं। और उन्हें अलग -अलग ढंग से परिभाषित करते हैं। पर जल तो जल ही है बूँद हो या समुद्र ,नदी हो या नाला .झरना हो या उत्स सभी में जल है। जल जल में मिलकर जल ही हो जाता है। अमर प्रकाश का जो अंश मानव देह में है वह वह यदि साधना के ऊर्ध्वगामी शक्ति से अनुचालित हो तो अनन्त प्रकाश पुंज में मिल जाने की क्षमता रखता है। अन्य चेतन देहों में भी अमरत्व की हल्की -फुल्की झाईं होती है। पर उसे सशक्त होने के लिये न जाने कितने जन्मों के बाद और कितनी योनियों में परिभ्रमण के बाद मानव काया में पहुचने का सुअवसर प्राप्त होता है।
नचिकेता :- भगवन ,क्या हमारे भीतर आत्मा स्वयं प्रकाशमान है या उसे और कहीं से प्रकाश पाने की आवश्यकता होती है। अमरत्व का जो केंद्र बिन्दु मानव काया में निहित है क्या उसे और कहीं से प्रकाश मिलता है। क्या सूर्य ,चन्द्र या तार मंडल उसे प्रकाश देते हैं। क्या मेघों में कौंधती बिजली से उसे प्रकाश मिलता है या ऋषियों की यज्ञ की अग्नि से आत्मा प्रकाशवान होती है।
यमराज :- नचिकेता तुमने एक अत्यन्त महत्त्व पूर्ण प्रश्न पूछा है। यह प्रश्न इतना गूढ़ है कि इसके उत्तर खोजने के लिये मुझे स्वयं दयानिधि के द्वार पर जाना पड़ा था और जानते हो उन्होंने क्या कहा ?उन्होंने कहा हे धर्मराज आप यमराज भी हैं। मृत्यु आपकी मुठ्ठी में है पर जीवन आपकी मुठ्ठी में नहीं है फिर उन्होंने आगे कहा सच मानना मृत्यु राज श्रष्टि की सृजन प्रक्रिया जब प्रारम्भ हो कर रही है गयी इसके बाद मैं भी इसका कर्ता नहीं रहा। आदि कारण तो मैं हूँ पर अब श्रष्टि स्वयं सन्चालित है। विज्ञान उसे प्रकृति का अनवरत प्रभाव कहता है। दर्शन उसे माया की मंचीय अवधारणा बताता है पर एक तटस्थ दर्शक और विवेचक की भांति मैं उस सबको अब एक अनियन्त्रित और अलक्षित लक्ष्य की ओर बढ़ता हुआ चेतन प्रवाह ही मानता हूँ। मैं स्वयं नहीं जानता कि मेरे भीतर वह कौन सी बाध्यता थी जिसने मुझे जड़ से चेतन की उत्पत्ति की ओर उन्मुख कर दिया। मुझे लगने लगा है कि मैं स्वयं माया के आत्मजाल में तो नहीं फसता जा रहा हूँ।हाँ तो तुमने पूछा था मनुष्य में निहित अमरत्व का प्रकाश कहाँ से आता है तो सुनो वह अमर तत्व स्वयं प्रकाशित है और उसके प्रकाश का प्रतिबिम्ब ही ब्रम्हाण्ड की सारी ज्योतित गंगाओं में प्रतिबिम्बित होता है। अमरत्व का वह अंश मानव अंत:स्थल में इस प्रकार स्थित है कि उससे उठने वाली चेतन तरंगें काया के प्रत्येक रोम ,प्रत्येक छिद्र और प्रत्येक इन्द्रिय अनुभव को स्पन्दित कर रही है। Reed Plant(नर कुल का पौधा ) को उसके पत्तों से हटाकर ही स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है इन्द्रिय तरंगों से प्रभावित ह्रदय में पड़ जाने वाली गांठें जब खुल जाती है और जब मोह का विकार मनुष्य से दूर हट जाता है तब उसकी आत्मा का प्रकाश अपनी झलक देता है और इस झलक पर यदि हम निरन्तर अपने अन्तर चक्षुओं को केन्द्रित रखें तो हमें अमरता की प्राप्ति हो सकती हैं। यह शरीर एक रथ है जिसे हमारी इन्द्रियाँ घोड़े की तरह खींच रहीं हैं। मनुष्य का मस्तिष्क उस लगाम की तरह है जो अपनी समझ के अनुसार इन घोड़ों को नियन्त्रित रखता है। आत्मा ही शरीर रथ की अन्तर वेदी पीठिका पर बैठी हुयी है। यदि मन को नियंत्रित कर हम उसे ठीक समय पर ठीक प्रकार बल्गा खीचने या ढील करने की अनुशासन प्रक्रिया से नहीं गुजरने देते तो कभी भी मनुष्य अमरत्व का आभाष नहीं कर सकेगा। शरीर रूपी यह रथ सांसारिक गलियों में चक्कर पर चक्कर खाता रहेगा और जन्म मरण की असंख्य वीथियों में और असंख्य कोटियों में भटकता फिरेगा। हे नचिकेता ,तुम अपने नाशवान शरीर में स्थित अविनाशी तत्व के प्रति सम्पूर्ण रूप से समर्पित हो जाओ। आत्मा न कभी जन्मती है और न कभी मरती है। वह न कहीं से आयी है और न कहीं जाकर उसे विनिष्ट होना है। नचिकेता तुम अजन्मा हो ,सदा जीवी हो शाश्वत हो और अखंडित तथा अभिभाज्य हो। उठो नचिकेता तुम्हे अब अपने पिता के पास धरती नामक गृह पर फिर से जाना है अब तो तुम अमर दर्शन का घूँट पी चुके हो। अब तुम्हें मेरे पास इसलिये नहीं आना है कि मैं तुम्हारे कर्मों का फलाफल सुनिश्चित करूँ। तुम अब संसार में रहकर भी संसार में नहीं रहोगे। तुम अब देह में रहकर भी देह में नहीं रहोग। तुम अब गेह में रहकर भी गेहमें नहीं रहोगे। तुम अदेह हो ,अगेय हो ,अशरीरी हो ,तुम प्रकाश की एक निरन्तर दीप्तिमान लौ हो। मैं तुम्हें अपने पुत्र और शिष्य के रूप में स्वीकार करतां हूँ। अपने भौतिक पिता के पास वापस जाओ और उन्हें मोह मुक्त करो। उन्हें बताना दानी होने का सम्मान पाना भी एक लालसा है। जब उनका कुछ है ही नहीं तो दान कैसा? मुक्त जीवी के लिये तो सम्पदा का ढेर रेत के टीले से अधिक और कुछ नहीं होता। नचिकेता ये पंक्तियाँ जो आत्मा से सम्बधित हैं और जिन्हें अब तुमने जीवन में पूरी तरह उतार लिया है भारत वर्ष के घर -घर में पहुचा देना।
"न जायते म्रियतो वा विपिश्चिननायं कुत्शिचन्न वभूव कश्चित्।अजो नित्य :शाश्वतोड़यं पुराणोंन हन्यते हन्यमाने शरीरे। (नेपथ्य में एक ऊँची ध्वनिजय हो मृत्यु के देवता ,जै हो अमरता के सन्देश वाहक , जय हो धर्म के अधिष्ठाता ,विजयी हो भारत की आर्ष परम्परा।)पटाक्षेप

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