Hotel vallabh darshan

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10/03/2023

व्रज - चैत्र कृष्ण तृतीया
Friday, 10 March 2023

मेघस्याम ज़री के घेरदार वागा, श्रीमस्तक पर गोल पाग और गोल चंद्रिका के शृंगार

जिन तिथियों के लिए प्रभु की सेवा प्रणालिका में कोई वस्त्र, श्रृंगार निर्धारित नहीं होते उन तिथियों में प्रभु को ऐच्छिक वस्त्र व श्रृंगार धराये जाते हैं.
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, ऋतु की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री की आज्ञा एवं प्रभु के तत्सुख की भावना से मुखियाजी के स्व-विवेक के आधार पर धराये जाते हैं.

ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार के रूप में आज श्रीजी को मेघस्याम ज़री का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर गोल चंद्रिका का श्रृंगार धराया जायेगा.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

बैठे हरि राधासंग कुंजभवन अपने रंग
कर मुरली अधर धरे सारंग मुख गाई ll
मोहन अतिही सुजान परम चतुर गुननिधान
जान बुझ एक तान चूक के बजाई ll 1 ll
प्यारी जब गह्यो बीन सकल कला गुनप्रवीन
अति नवीन रूपसहित वही तान सुनाई ll
वल्लभ गिरिधरनलाल रिझ दई अंकमाल
कहत भलें भलें लाल सुन्दर सुखदाई ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में मेघस्याम ज़री की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को मेघस्याम रंग की ज़री का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा धराये जाते हैं. गुलाबी रंग के ठाडे वस्त्र धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को मध्य का (घुटने तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर मेघस्याम रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, चमकनी गोल-चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में एक जोड़ी हीरा के कर्णफूल धराये जाते हैं.
श्रीकंठ में एक दुलड़ा एक सतलड़ा धराये जाते हैं.
गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, गुलाबी मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट मेघस्याम एवं गोटी चाँदी की आती है.

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संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के आभरण बड़े कर छेड़ान के (छोटे) आभरण धराये जाते हैं. शयन दर्शन में श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा रूपहरी धराया जाता है.



09/03/2023

व्रज - चैत्र कृष्ण द्वितीया
Thursday, 09 March 2023

लाल नेक भवन हमारे आवो ।
जो मांगो सो देहो मोहन ले मुरली कल गावो ।।१।।
मंगलचार करो गृह मेरे संगके सखा बुलावो ।
करो विनोद सुंदर युवतीनसों प्रेम पीयूष पीवावो ।।२।।
बलबल जाऊं मुखारविंदकी ललित त्रिभंग दीखावो ।
परमानंद सहचरी रसभर ले चली करत उपावो ।।३।।

द्वितीया पाट

आज प्रभु को नियम के सुनहरी ज़री के चाकदार वस्त्र और श्रीमस्तक पर हीरा की कुल्हे पर सुनहरी घेरा धराये जाते हैं.

उत्सव के कारण गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में चाशनी लगे पक्के गुंजा अरोगाये जाते हैं. इसके अतिरिक्त प्रभु को दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी का भोग भी अरोगाया जाता है.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.

श्रृंगार दर्शन

साज – आज श्रीजी में फूलक शाही ज़री की हरे हांशिया वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर से सफेदी बड़ी कर (हटा) दी जाती है. उत्सव के दिवसों में मलमल के गादी-तकियों में सफ़ेद बिछावट नहीं की जाती इसलिए ऐसा कहा जाता है.

वस्त्र – आज श्रीजी को सुनहरी ज़री के बिना किनारी के सूथन, चोली एवं चाकदार वागा धराये जाते हैं. पटका रूपहरी ज़री का धराया जाता हैं. ठाडे वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा – हीरा की प्रधानता के मोती, माणक, पन्ना एवं जड़ाव स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर जड़ाव स्वर्ण की कुल्हे के ऊपर सुनहरी जड़ाव का घेरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में हीरा के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर हीरा की चोटीजी धरायी जाती है.
नीचे सात पदक ऊपर हीरा, पन्ना, माणक, मोती के हार व माला धराये जाते हैं. कली, कस्तूरी आदि माला धरायी जाती हैं.
चैत्री गुलाब के पुष्प की सुन्दर थागवाली वनमाला धरायी जाती है.
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, हीरा के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उत्सव का एवं गोटी जड़ाऊ की आती है.
आरसी चार झाड़ की दिखाई जाती है.

(आगे का सेवाक्रम आज की दूसरी पोस्ट में )



04/03/2023

व्रज - फाल्गुन शुक्ल द्वादशी
Saturday, 04 March 2023

खेलतु फाग लख्यौ पिय प्यारी कों,
ता सुख की उपमा किहीं दीजै।
देखत ही बनि आवै भलै 'रसखान' ,
कहा है जो वारि न कीजै।।
ज्यौं ज्यौं छबीली कहै पिचकारी लै ,
एक लई यह दूसरी लीजे।
त्यौं त्यौं छबीलो छकै छाक सौं ,
हेरै हंसे न टरै खरौ भीजे।

आप (तिलकायत श्री) के श्रृंगार (त्रयोदशी का श्रृंगार)

नवमी से द्वितीया पाट के दिन तक प्रभु को विशिष्ट श्रृंगार धराये जाने प्रारंभ हो जाते हैं. इन्हें ‘आपके श्रृंगार’ अथवा ‘तिलकायत श्री के श्रृंगार’ कहा जाता है. ‘आपके श्रृंगार’ डोलोत्सव के अलावा जन्माष्टमी एवं दीपावली के पूर्व भी धराये जाते हैं.इसी शृंखला में आज त्रयोदशी का श्रृंगार धराया जाता हैं.

विशेष – आज सभी समय झारीजी यमुनाजल से भरी जाती है और दो समय आरती थाली में होती है.

इन दिनों प्रभु को आपके श्रृंगार धराये जा रहे हैं.
इसी श्रृंखला में आज श्रीजी को नियम के श्वेत जामदानी के चाकदार वागा व श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग के ऊपर सुनहरी जमाव का कतरा का श्रृंगार धराया जाता है. आभरण छेड़ान से दो अंगुल नीचे तक धराये जाते हैं.

फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से श्रीजी में डोलोत्सव की सामग्रियां सिद्ध होना प्रारंभ हो जाती है. इनमें से कुछ सामग्रियां फाल्गुन शुक्ल नवमी से प्रतिदिन गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में श्रीजी को अरोगायी जाती हैं और डोलोत्सव के दिन भी प्रभु को अरोगायी जायेंगी.

इस श्रृंखला में आज श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में दही की सेव (पाटिया) के लड्डू अरोगाये जाते हैं.

आज के अतिरिक्त दही की सेव (पाटिया) के लड्डू केवल डोलोत्सव, अक्षय नवमी व नागपंचमी के दिन अरोगाये जाते हैं.

राजभोग में इन दिनों भारी खेल होता है. पिछवाई पूरी गुलाल से भरी जाती है और उस पर अबीर से चिड़िया मांडी जाती है.

प्रभु की कमर पर एक पोटली गुलाल की बांधी जाती है. ठोड़ी (चिबुक) पर तीन बिंदी बनायी जाती है.

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राजभोग दर्शन -

कीर्तन – (राग : सारंग)

हरिको डोल देख व्रजवासी फूले l गोपी झुलावे गोविंद झूले ll 1 ll
नंद चंद गोकुल में सोहे l मुरली मन्मथ मन मोहे ll 2 ll
कमलनयन को लाड़ लड़ावे प्रमुदित गीत मनोहर गावे ll 3 ll
रसिक शिरोमनि आनंद सागर l ‘सूरदास’ प्रभु मोहननागर ll 4 ll

साज – आज श्रीजी में राजभोग में सफ़ेद मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल व अबीर से भारी खेल किया जाता है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को सफ़ेद जामदानी का छींट वाला सूथन, चोली एवं चाकदार वागा धराये जाते हैं. सभी वस्त्र सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र अमरसी रंग के धराये जाते हैं. सभी वस्त्रों पर अबीर, गुलाल आदि को छांटकर कलात्मक रूप से खेल किया जाता है.
प्रभु के कपोल पर भी गुलाल, अबीर लगाये जाते हैं. अत्यधिक गुलाल खेल के कारण वस्त्र लाल प्रतीत होते हैं.

श्रृंगार – श्रीजी को आज मध्य का (छेड़ान से दो अंगुल नीचे तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. लाल मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर स्याम खिड़की की सफ़ेद छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, सुनहरी नागफणी (जमाव) का कतरा व तुर्री एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
श्रीकर्ण में मीना के चार कर्णफूल धराये जाते हैं.
श्रीकंठ में एक अक्काजी की माला धरायी जाती है. श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. भारी खेल के कारण सर्व श्रृंगार रंगों से सरोबार हो जाते हैं और प्रभु की छटा अद्भुत प्रतीत होती है.
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, लाल मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट चीड़ का, गोटी चांदी की व आरसी दोनो समय बड़ी डांडी की आती है.

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संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के आभरण बड़े कर छेड़ान के (छोटे) आभरण धराये जाते हैं. शयन दर्शन में श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा रूपहरी धराये जाते है.
यदि सर्दी कम हो और कोई मनोरथी हो तो श्री तिलकायतजी की आज्ञा लेकर शयन में पुष्पों के आभरण धराये जा सकते हैं.



22/02/2023
21/02/2023

व्रज - फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा
Tuesday, 21 February 2023

नवरंगी लाल बिहारी हो तेरे,द्वै बाप,द्वै महतारी ।।
नवरंगीले नवल बिहारी हम, दैंहि कहा कही गारी ।।१।।
द्वै बाप सबै जग जाने, सोतो वेद पुरान बखाने।।
वसुदेव देवकी जाये, सो तो नंदमहर के आये ।।२।।
हम बरसानेकी नारी, तुम्हें दें दें हँसि गारी ।।
तेरी भूआ कुंति रानी, सो तो सूरज देखी लुभानी।।३।।
तेरी बहन सुभद्रा क्वारी, सो तो अर्जुन संग सिधारी।।
तेरी द्रुपदसुता सी भाभी, सो तो पांच पुरुष मिलि लाभी।।४।।
हम जाने जू हम जानै, तुम उखल हाथ बँधाने।।
हम जानी बात पहिचानी, तुम कब ते दधि दानी।।५।।
तेरी माया ने सब जग ढूंढ्यो,कोई छोड्यो न बारो बूढ्यो।।
"जन कृष्णा" गारी गावे, तब हाथ थार कों लावे।।६।।

चंदन की चोली

विशेष - माघ और फाल्गुन मास में होली की धमार एवं विविध रसभरी गालियाँ भी गायी जाती हैं.
विविध वाद्यों की ताल के साथ रंगों से भरे गोप-गोपियाँ झूमते हैं. कई बार गोपियाँ प्रभु को अपने झुण्ड में ले जाती हैं और सखी वेश पहनाकर नाच नचाती हैं और फगुआ लेकर ही छोडती हैं.

इसी भाव से आज श्रीजी को नियम से चन्दन की चोली धरायी जाती है. फाल्गुन मास में श्रीजी चोवा, गुलाल, चन्दन एवं अबीर की चोली धराकर सखीवेश में गोपियों को रिझाते हैं.

कीर्तनों में राजभोग समय अष्टपदी गाई जाती है.
राजभोग के खेल में प्रभु के कपोल मांडे जाते हैं वहीँ चोली पर कोई भी सामग्री से खेल नहीं होता.

वैष्णवों पर फेंट भर कर गुलाल उड़ाई जाती है.

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राजभोग दर्शन -

कीर्तन (राग : सारंग)

अहो पिय लाल लड़ेंती को झुमका, सरस सुर गावत मिल व्रजबाल, अहो कल कोकिल कंठ रसाल ll
लाल बलि झुमका हो ll ध्रु ll
नवजोबनी शरद शशि वदनी युवती यूथ जुर आई l नवसत साज श्रृंगार सुभग तन करन कनक पिचकाई ll
एकन सुवन यूथ नवलासी दमिनीसी दरसाई l एक सुगंध संभार अरगजी भरन नवलको आई ll 1 ll
पहेरे वसन विविध रंगरंगन अंग महारस भीनी l अतरोंटा अंगिया अमोल तन सुख सारी अति झीनी ll
गजगति मंद मराल चाल झलकत किंकिणी कटि झीनी l चोकी चमक उरोज युगल पर आन अधिक छबि दीनी ll 2 ll
मृगमद आड़ ललाट श्रवण ताटक तरणि धुति हारी l खंजन मान हरन अखियां अंजन रंजित अनियारी ll
यह बानिक बन संग सखी लीनी वृषभान दुलारी l एक टक दृष्टि चकोर चंद ज्यों चितये लाल विहारी ll 3 ll
रुरकत हार सुढ़ार जलजमनि पोत पुंज अति सोहे l कंठसरी दुलरी दमकनि चोका चमकनि मन मोहे ll
बेसर थरहरात गजमोती रति भूली गति जो हे l सीस फूल सीमान्त जटित नग बरन करन कवि को हे ll 4 ll
नवलनिकुंज महल रसपुंज भरे प्यारी पिय खेले l केसर और गुलाल कुसुमजल घोर परस्पर मेले ll
मधुकर यूथ निकट आवत झुक अति सुगंध की रेले l प्रीतम श्रमित जान प्यारी तब लाल भूजा भर झेले ll 5 ll
बहुविध भोग विलास रासरस रसिक विहारन रानी l नागर नृपति निकुंज विहारी संग सुरति रति मानी ll
युगलकिशोर भोर नही जानत यह सुख रैन विहानी l प्रीतम प्राण पिया दोऊ विलसत ललितादिक गुनगानी ll 6 ll

साज - आज श्रीजी में आज सफ़ेद रंग की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल, अबीर व चन्दन से कलात्मक खेल किया जाता है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को सफ़ेद लट्ठा के सूथन, घेरदार वागा एवं चोली धराये जाते हैं. चोली के ऊपर आधी बाँहों वाली चन्दन की चंदनिया रंग की चोली धरायी जाती है. चंदनिया रंग का ही कटि-पटका ऊर्ध्वभुजा की ओर धराया जाता है. गहरे हरे रंग के ठाड़े वस्त्र धराये जाते हैं.
चोली को छोड़कर अन्य सभी वस्त्रों पर अबीर, गुलाल आदि को छांटकर कलात्मक रूप से खेल किया जाता है.
प्रभु के कपोल पर भी गुलाल, अबीर लगाये जाते हैं.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. लाल मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर सफ़ेद रंग की खिड़की की छज्जेदार-पाग के ऊपर सिरपैंच, दोहरा कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में गोल कर्णफूल धराये जाते हैं.
श्रीकंठ में आज त्रवल नहीं धराये जाते वहीँ कंठी धरायी जाती है. श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, हरे मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट चीड़ का व गोटी फाल्गुन की आती है.

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संध्या-आरती दर्शन उपरांत श्रीमस्तक व श्रीकंठ के आभरण बड़े किये जाते हैं. शयन समय श्रीमस्तक पर रुपहली लूम-तुर्रा धराये जाते हैं.


20/02/2023

व्रज - फाल्गुन कृष्ण अमावस्या
Monday, 20 February 2023

सोमवती अमावस्या

अरि हों श्याम रंग रंगी ।
रिझवे काई रही सुरत पर सुरत मांझ पगी ।।१।।
देख सखी अेक मेरे नयनमें बैठ रह्यो करी भौन ।
घेनु चरावन जात वृंदावन सौंधो कनैया कोन ।।२।।
कौन सुने कासौ कहे सखी कौन करे बकवाद ।
तापे गदाधर कहा कही आवे गूंगो गुड़को स्वाद ।।३।।

चोवा से रंगे स्याम घेरदार वागा, श्रीमस्तक पर गोल पाग और क़तरा के शृंगार

विशेष – आज फाल्गुन की अमावस्या के दिन श्रीजी को नियम के चोवा से रंगे दोहरी सुनहरी किनारी के स्याम घेरदार वस्त्र एवं श्रीमस्तक पर गोल-पाग के ऊपर सुनहरी चमक का क़तरा धराया जाता है.

श्याम वस्त्रों में श्यामसुंदर प्रभु की अद्भुत छटा का शब्दों में वर्णन करना किसी के लिए संभव नहीं है.

राजभोग में फेंट में भर कर गुलाल खिलायी जाती हैं. चोवा के वस्त्र को गुलाल, अबीर, चंदन, चोवा सबसे खिलाया जाता हैं.

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राजभोग दर्शन

कीर्तन – (राग : सारंग)

मोहन खेलत होरी ll ध्रु ll
बंसीबट जमुनातट कुंजन तर ठाड़े बनवारी l उतही सखिन को मंडल जोर श्रीवृषभान दुलारी ll
होड़ा होड़ी करत परस्पर गावत आनंद गारी l अबीर गुलाल फेंट भर भामिनी करकंचन पिचकारी ll 1 ll
बाजत बीन बांसुरी किन्नरी महुवर अरु मुख चंगा l आवाज अमृत कुंडली अघवट तातें सरस उपंगा ll
ताल मृदंग झांझ डफ बाजत सूरके उठत तरंगा l गावत नाचत करत कुतूहल छिरकत केसर अंगा ll 2 ll
तबहि श्याम सब सखा बुलाये सबहिन मतो सुनाये l भैया तुम चोक्कस रहीयो मति कोऊ उपाय गहायो ll
जो काहू को पकर पाये है करि है मन को भायो l तातें सावधान व्है रहियो में तुमको समझायो ll 3 ll
तबही किसोरी राधा गोरी मनमें मतोजुकीनो l एक सखी ता बोल आपनी भेख सुबल को दीनो ll
ताके मिलन चले उठ मोहन सखा न कोई चीन्हो l नैंसिक बात लगाय लालको पाछे ते गहिलीनो ll 4 ll....अपूर्ण

साज – आज श्रीजी में सफ़ेद मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल, अबीर व चन्दन से खेल किया जाता है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को चोवा से रंगा श्याम रंग का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा धराये जाते हैं. उर्ध्वभुजा की ओर चोवा से रंगा श्याम रंग का ही कटि-पटका भी धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं. सभी वस्त्र दोहरे सुनहरी किनारी से सुसज्जित होते हैं. सभी वस्त्रों पर अबीर, गुलाल आदि को छांटकर कलात्मक रूप से खेल किया जाता है. प्रभु के कपोल पर भी गुलाल, अबीर लगाये जाते हैं.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. सफ़ेद मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर श्याम रंग की गोल-पाग के ऊपर सिरपैंच सुनहरी चमक का क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये जाते हैं.
सफ़ेद पुष्पों की कलात्मक थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, चाँदी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट चीड़ का व गोटी फाल्गुन की आती है.

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संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा सुनहरी धराये जाते हैं.


13/02/2023

व्रज - फाल्गुन कृष्ण सप्तमी
Monday, 13 February 2023

आज की पोस्ट बहुत लम्बी पर उत्सव के आनंद के रंग से सराबोर है अतः समय देकर पूरी पढ़ें

सभी वैष्णवों को निकुंजनायक श्रीजी व श्री लाड़लेलाल प्रभु के पाटोत्सव की ख़ूबख़ूब बधाई

निकुंजनायक श्रीजी व श्री नवनीतप्रियाजी का पाटोत्सव

होली खेल के 40 दिनों में पाटोत्सव का अपना अलग ही महत्व है, जो प्रभु कृपा और सर्व-समर्पण की भावना से उत्पन्न हुआ है.

श्रीजी प्रभु आज ही के दिन, श्री गुसाईंजी के घर सतघरा पधारे थे। श्री गिरिधरजी ने श्रीजी की आज्ञा से आपश्री को अपने कंधों पर विराजित कर उन्हें अपने घर पधरा ले गए.
वहाँ श्रीजी ने श्रीगुसाँईजी के परिवार के सभी बालक, बेटीजी और बहूजी के साथ होली खेली.
तब श्री गिरिधरजी के परिवार की सभी महिलाओं ने अपने सभी आभरणों (आभूषणों) का प्रभु चरणों में समर्पण किया (आज भी सर्व-समर्पण का प्राचीन जडाव का चौखटा प्रभु जन्माष्टमी आदि कई विशिष्ट दिनों पर अंगीकार करते हैं).
इस समय जब श्री गिरिधरजी के बहूजी की नथ रह गयी, तब श्रीजी ने अपनी वेणुजी से संकेत किया और वह भी माँग ली.

इसे ही प्रभु कृपा कहते हैं.

विशेष – आज निकुंजनायक श्रीजी व श्री नवनीतप्रियाजी का पाटोत्सव है.
आज के दिन श्रीजी प्रभु व्रज से पधारने के उपरांत वर्तमान श्रीजी मंदिर के बाहर के चौक में स्थित खर्च-भण्डार में बिराजे थे.यहाँ पर प्रभु तीन बार (संवत 1623, 1728 व 1864) में बिराजे एवं कुछ वर्ष उपरांत वर्तमान मंदिर निर्माण के पूर्ण होने पर डोलोत्सव के अगले दिन द्वितीया पाट के दिन अपने वर्तमान पाट पर विराजे.

खर्च-भण्डार में जिस स्थान पर प्रभु विराजे उस स्थान पर श्रीजी की छवि स्थित है और उसकी सेवा प्रतिदिन श्रीजी के घी-घरिया करते हैं.
आज खर्च-भंडार में विराजित श्रीजी की छवि को सैंकड़ों लीटर केसर व मेवे युक्त दूध का भोग अरोगाया जाता है और शयन पश्चात सभी वैष्णवों एवं नगरवासियों को वितरित किया जाता है.

आज से सेवाक्रम में कुछ परिवर्तन होंगे.

पुष्टिमार्ग में प्रत्येक ऋतु का आगमन व पूर्व ऋतु की विदाई प्रभु सुखार्थ धीरे-धीरे क्रमानुसार होती है.

प्रभुसेवा में आज से शीतकाल की विदाई आरंभ हो गयी है अतः जल रंगों (Water Colors) के चित्रांकन की पिछवाईयां धरायी जानी प्रारंभ हो जाती है.

आज से डोलोत्सव तक इस प्रकार की पिछवाईयां केवल श्रृंगार के दर्शनों में ही धरायी जाती हैं एवं ग्वाल में बड़ी (हटा) कर सफ़ेद मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती हैं क्योंकि राजभोग में प्रभु को गुलाल खेलायी जाती है.

आज से चरणारविंद के श्रृंगार धराये जाते हैं. आज से प्रभु को मोजाजी भी नहीं धराये जाते परन्तु यदि अधिक शीत हो तो आज का दिन छोड़कर प्रभु सुखार्थ शीत रहने तक राजभोग तक मोजाजी पुनः धराये जा सकते हैं.

आज से डोलोत्सव तक श्रीजी और श्री नवनीतप्रियाजी में ख्याल (स्वांग) प्रारंभ होंगे. ख्याल बनने वाले बालक, बालिकाएं विविध देवों, गन्धर्वों एवं सखाओं के रूप धरकर ख्याल बनकर शयन के दर्शन में प्रभु के समक्ष नाचते हैं जिससे बालभाव में प्रभु आनंदित होते हैं.

कई वर्षों पूर्व जब प्रभु व्रज में थे तब वहां इस प्रकार के ख्याल (स्वांग) निकलते थे. श्रीजी का मन ऐसे ख्याल (स्वांग) देखने बाहर जाने का हुआ तब श्री गिरधरजी ने प्रभु के सुखार्थ सतघरा में ही ख्याल (स्वांग) बनाने की प्रथा प्रारंभ की जो कि आज भी जारी है.

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प्रभु को नियम के केसरी (अमरसी) डोरिया के रुपहली ज़री की तुईलैस की दोहरी किनारी से सुसज्जित घेरदार वागा, चोली एवं कटि-पटका धराये जाते हैं. चोली के ऊपर आधी बाँहों वाली श्याम रंग की चोवा की चोली धरायी जाती है.

श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में खरमंडा, केसर-युक्त गेहूं के रवा (संजाब) की खीर, श्रीखंडवड़ी का डबरा, मंगोड़ा (मूंग की दाल के गोल दहीवड़ा) की छाछ व दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी का भोग अरोगाया जाता है.

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श्रृंगार दर्शन –

कीर्तन – (राग : देवगंधार)

आज माई मोहन खेलन होरी l
नवतन वेष काछी ठाड़े भये संग राधिकागोरी ll 1 ll
अपने भामते आये देखनको जुरि जुरि नवलकिशोरी l
चोवा चन्दन और कुंकुमा मुख मांडत ले रोरी ll 2 ll
छूटी लाज तब तन संभारत अति विचित्र बनी जोरी l
मच्यो खेल रंग भयो भारे या उपमाको कोरी ll 3 ll
देत असीस सकल व्रजवनिता अंग अंग सब भोरी l
‘परमानंद’ प्रभु प्यारीकी छबी पर गिरधर देत अकोरी ll 4 ll

साज – आज प्रभु को होली के सुन्दर चित्रांकन वाली पिछवाई धरायी जाती है जिसमें व्रजभक्त प्रभु को होली खिला रहे हैं और ढप वादन के संग होली के पदों का गान कर रहे हैं. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.राजभोग में श्वेत मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल, चन्दन से खेल किया जाता है.

वस्त्र – आज श्रीजी को केसरी डोरिया के दोहरा रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, घेरदार वागा, चोली एवं कटि-पटका धराये जाते हैं. चोली के ऊपर आधी बाँहों वाली श्याम रंग की चोवा की चोली धरायी जाती है. ठाड़े वस्त्र श्वेत चिकने लट्ठा के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. फ़ीरोज़ा के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर केसरी रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम की कीलंगी एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में फ़िरोज़ा के एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.
श्रीकंठ में चार माला धरायी जाती है.
पीले पुष्पों की कलात्मक थागवाली एक मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, फ़ीरोज़ा के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट चीड़ का एवं गोटी फागुन की आती है.

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04/02/2023

व्रज – माघ शुक्ल चतुर्दशी
Saturday, 04 February 2023

श्वेत लट्ठा के घेरदार वागा ,लाल बंध एवं श्रीमस्तक पर लाल गोल पाग पर क़तरा के शृंगार

जिन तिथियों के लिए प्रभु की सेवा प्रणालिका में कोई वस्त्र, श्रृंगार निर्धारित नहीं होते उन तिथियों में प्रभु को ऐच्छिक वस्त्र व श्रृंगार धराये जाते हैं.
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, ऋतु की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री की आज्ञा एवं प्रभु के तत्सुख की भावना से मुखियाजी के स्व-विवेक के आधार पर धराये जाते हैं.

ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार के रूप में आज श्रीजी को श्वेत लट्ठा का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा, लाल बंध एवं श्रीमस्तक पर लाल गोल पाग पर क़तरा का श्रृंगार धराया जायेगा.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : बिलावल)

नंदसुवन व्रजभामते फाग संग मिल खेलोजु l
आज हमें तुम जानि है जो युवती दल पेलोजु ll 1 ll
रसिक सिरोमनि सांवरे श्रवन सूनत उठि धाये l
बलि समेत सब टेरिके घरघर तें सखा बुलाये ll 2 ll
बाजे बहुविध बाजही ताल मृदंग उपंग l
डिमडिम दुंदुभी झालरी आवाज कर मुख चंग ll 3 ll...(अपूर्ण)

साज – आज श्रीजी में श्वेत रंग की मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल, चन्दन से खेल किया जाता है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को श्वेत लट्ठा का सूथन, चोली, घेरदार वागा एवं लाल रंग के मोजाजी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र पीले रंग के धराये जाते हैं. लाल बंध धराया जाता हैं. सभी वस्त्रों पर अबीर, गुलाल आदि की टिपकियों से कलात्मक रूप से खेल किया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को फ़ागण का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर लाल रंग की पाग के ऊपर सिरपैंच, सुनहरी जमाव (नागफणी) का कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये जाते हैं.
आज त्रवल नहीं धराया जाता हैं कंठी धरायी जाती हैं.
गुलाबी एवं पीले पुष्पों की रंग-बिरंगी सुन्दर थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, स्याम मीना के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट चीड़ का एवं गोटी फागुण की आती है.

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संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा रूपहरी धराये जाते हैं.



31/01/2023

व्रज – माघ शुक्ल दशमी
Tuesday 31 January 2023

श्वेत लट्ठा के चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर गुलाबी ग्वालपगा के ऊपर पगा चंद्रिका के शृंगार

जिन तिथियों के लिए प्रभु की सेवा प्रणालिका में कोई वस्त्र, श्रृंगार निर्धारित नहीं होते उन तिथियों में प्रभु को ऐच्छिक वस्त्र व श्रृंगार धराये जाते हैं.
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, ऋतु की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री की आज्ञा एवं प्रभु के तत्सुख की भावना से मुखियाजी के स्व-विवेक के आधार पर धराये जाते हैं.

ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार के रूप में आज श्रीजी को श्वेत लट्ठा के चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर गुलाबी ग्वालपगा के ऊपर पगा चंद्रिका का शृंगार धराया जायेगा.

मेरी जानकारी के अनुसार आज श्रीजी को आज प्रभु को श्वेत रंग के लट्ठा के चाकदार वस्त्र पर धराये जाते है. श्रीमस्तक पर गुलाबी रंग के ग्वाल पगा के ऊपर बीच की चंद्रिका धरायी जाती है.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : आसावरी)

श्याम सुभगतन शोभित छींटे नीकी लागी चंदनकी ।
मंडित सुरंग अबीरकुंकुमा ओर सुदेश रजवंदनकी ।।१।।
कुंभनदास मदन तनमन बलिहार कीयो नंदनंदनकी ।
गिरिधरलाल रची विधि मानो युवति जन मन कंदनकी ।।२।।

साज – आज श्रीजी में श्वेत मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल, चन्दन से खेल किया जाता है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को सफ़ेद लट्ठा का सूथन, चोली, चाकदार वागा एवं लाल रंग के मोजाजी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं. सभी वस्त्रों पर अबीर, गुलाल आदि की टिपकियों से कलात्मक रूप से खेल किया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को फ़ागण का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.

श्रीमस्तक पर गुलाबी रंग के ग्वालपगा के ऊपर सिरपैंच, बीच की चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में लोलकबिंदी धरायी जाती हैं.
गुलाबी एवं पीले पुष्पों की रंग-बिरंगी सुन्दर थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, हरे मीना के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट चीड़ का एवं गोटी फागुन की आती है.

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संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर पगा रहे लूम तुर्रा नहीं आवे.



30/01/2023

व्रज – माघ शुक्ल नवमी
Monday, 30 January 2023

श्वेत लट्ठा के घेरदार वागा ,कटि (कमर) पर एक विशेष स्वर्ण का चपड़ास (घुंडी-नाका) एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग और गोल चंद्रिका के शृंगार

जिन तिथियों के लिए प्रभु की सेवा प्रणालिका में कोई वस्त्र, श्रृंगार निर्धारित नहीं होते उन तिथियों में प्रभु को ऐच्छिक वस्त्र व श्रृंगार धराये जाते हैं.
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, ऋतु की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री की आज्ञा एवं प्रभु के तत्सुख की भावना से मुखियाजी के स्व-विवेक के आधार पर धराये जाते हैं.

ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार के रूप में आज श्रीजी को श्वेत लट्ठा का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा, प्रभु की कटि (कमर) पर एक विशेष स्वर्ण का चपड़ास (घुंडी-नाका) का श्रृंगार धराया जायेगा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर गोल चंद्रिका का श्रृंगार धराया जायेगा.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : आसावरी)

श्याम सुभगतन शोभित छींटे नीकी लागी चंदनकी ।
मंडित सुरंग अबीरकुंकुमा ओर सुदेश रजवंदनकी ।।१।।
कुंभनदास मदन तनमन बलिहार कीयो नंदनंदनकी ।
गिरिधरलाल रची विधि मानो युवति जन मन कंदनकी ।।२।।

साज – आज श्रीजी में श्वेत मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल, चन्दन से खेल किया जाता है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को सफ़ेद रंग का सूथन, चोली, घेरदार वागा एवं लाल रंग के मोजाजी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र हरे रंग के धराये जाते हैं. सभी वस्त्रों पर अबीर, गुलाल आदि की टिपकियों से कलात्मक रूप से खेल किया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को फ़ागण का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, गोल चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये जाते हैं.
आज प्रभु की कटि (कमर) पर एक विशेष सोने का चपड़ास (घुंडी-नाका) धराए जाने से त्रवल नहीं धराया जाता हैं. आज प्रभु को श्रीकंठ में हीरा की कंठी धराई जाती हैं.
श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
श्रीहस्तं में स्वर्ण के एक वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट चीड़ का एवं गोटी फागुन की आती हैं.

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संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. घुंडी-नाका रहे. श्रीमस्तक
पर लूम-तुर्रा रूपहरी धराये जाते हैं.




26/01/2023

व्रज – माघ शुक्ल पंचमी
Thursday, 26 January 2023

नवल वसंत नवल वृंदावन खेलत नवल गोवर्धनधारी ।
हलधर नवल नवल ब्रजबालक नवल नवल बनी गोकुल नारी ।।१।।
नवल जमुनातट नवल विमलजल नौतन मंद सुगंध समीर ।
नवल कुसुम नव पल्लव साखा कुंजत नवल मधुप पिक कीर ।।२।।
नव मृगमद नव अरगजा वंदन नौतन अगर सुनवल अबीर ।
नवचंदन नव हरद कुंकुमा छिरकत नवल परस्पर नीर ।।३।।
नवलधेनु महुवरि बाजे, अनुपम भूषण नौतन चीर ।
नवलरूप नव कृष्णदास प्रभुको, नौतन जस गावत मुनि धीर ।।४।।

सभी वैष्णवजन को बसंतोत्सव की ख़ूबख़ूब बधाई

नियम के श्वेत अड़तु के सूथन, चोली, घेरदार वागा एवं श्रीमस्तक पर श्याम खिड़की की श्वेत पाग के ऊपर सादी मोर-चंद्रिका धरायी जाती है.

आज से प्रतिदिन छोगा व श्रीहस्त में पुष्पों की छड़ी धरी जाती है.
आज से 10 दिन तक जैसे श्रृंगार हों उसी भाव के बसंत के पद गाये जाते हैं.
प्रत्येक पद बसंत राग में ही गाये जाते हैं.

श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में मेवाबाटी व दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी का भोग अरोगाया जाता है.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : वसंत)

श्रीपंचमी परममंगल दिन, मदन महोच्छव आज l
वसंत बनाय चली व्रजसुंदरी ले पूजा को साज ll 1 ll
कनक कलश जलपुर पढ़त रतिकाममन्त्र रसमूल l
तापर धरी रसाल मंजुरी आवृत पीत दुकूल ll 2 ll
चोवा चंदन अगर कुंकुमा नव केसर घन सार l
धुपदीप नाना निरांजन विविध भांति उपहार ll 3 ll
बाजत ताल मृदंग मुरलिका बीना पटह उमंग l
गावत वसंत मधुर सुर उपजत तानतरंग ll 4 ll
छिरकत अति अनुराग मुदित गोपीजन मदनगुपाल l
मानों सुभग कनिकदली मधि शोभित तरुन तमाल ll 5 ll
यह विधि चली रति राज वधावन सकल घोष आनंद l
‘हरिजीवन’ प्रभु गोवर्धनधर जय जय गोकुल चंद ll 6 ll

साज – आज श्रीजी में श्वेत मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को श्वेत अड़तु का सूथन, चोली, घेरदार वागा एवं लाल रंग के मोजाजी धराये जाते हैं. पटका मोठड़ा का आता है. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं. सभी वस्त्रों पर अबीर, गुलाल आदि से कलात्मक रूप से खेल किया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी में मध्य का (छेड़ान से दो अंगुल नीचे तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. फाल्गुन के माणक, स्वर्ण एवं लाल मीना के मिलवा सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर श्वेत पाग (श्याम खिड़की की) के ऊपर सिरपैंच के स्थान पर पट्टीदार जड़ाऊ कटिपेंच, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
श्रीकर्ण में चार कर्णफूल धराये जाते हैं. गुलाबी एवं पीले पुष्पों की कलात्मक थागवाली दो मालाजी धरायी जाती है.

श्रीहस्त में पुष्प की छड़ी, सोना के बंटदार वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं. आज विशेष रूप से श्रीमस्तक पर सिरपैंच में आम के मोड़ धराये जाते हैं.
पट चीड़ का, गोटी चांदी की व आरसी दोनो समय बड़ी डांडी की आती है.





18/01/2023

व्रज – माघ कृष्ण एकादशी
Wednesday, 18 January 2023

आज हरि रैन उनींदे आये ।
अटपटी पाग लटपटी अलकें
भृकुटि अंग नचाये ।।१।।
अंजन अधर ललाट महावर
नयन तम्बोल खवाये ।
सूरदास कहे मोहे अचम्भो
हरि रात रात में तीन तिलक
कहांते पाये ।।२।।

षट्तिला एकादशी, डोलोत्सव का प्रतिनिधि का श्रृंगार

बड़े उत्सवों के पहले उस श्रृंगार का प्रतिनिधि का श्रृंगार धराया जाता है.

विक्रमाब्द १९७३-७४ में तत्कालीन परचारक श्री दामोदरलालजी ने प्रभु प्रीति के कारण अपने पिता और तिलकायत श्री गोवर्धनलालजी से विनती कर इस श्रृंगार की आज्ञा ली और यह प्रतिनिधि का श्रृंगार धराया था.

तदुपरांत यह श्रृंगार प्रतिवर्ष धराया जाता है.

बसंत-पंचमी के पूर्व श्रीजी में गुलाल वर्जित होती है अतः पिछवाई एवं वस्त्रों पर सफ़ेद और लाल रंग के वस्त्रों को काट कर ऐसा सुन्दर भरतकाम (Work) किया गया है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि प्रभु ने गुलाल खेली हो.

श्रीजी को आज के दिन षट्तिला एकादशी के कारण विशेष रूप से गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में तिलवा (तिल) के बड़े लड्डू अरोगाये जाते हैं,

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सुधराई)

आज बने नवरंग छबीले डगमगात पग अंग-अंग ढीले ll 1 ll
जावक पाग रंगी धों कैसेरी जैसे करी कहो पिय तैसे ll 2 ll
बोलत वचन बहुत अलसाने पीक कपोल अधर लपटाने ll 3 ll
कुमकुम हृदय भूजन छबि वंदन ‘सूरश्याम’ नागर मनरंजन ll 4 ll

साज – आज श्रीजी में पतंगी (गुलाल जैसे) रंग की, अबीर व चूवा के भाव से सफ़ेद एवं श्याम रंग की टिपकियों के भरतकाम से डोल उत्सव सी सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. इसे देख के ऐसा प्रतीत होता है कि प्रभु ने गुलाल खेली हो. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है एवं स्वरुप के सम्मुख लाल रंग की तेह बिछाई जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को पतंगी रंग का डोल उत्सव का सूथन, चोली, घेरदार वागा धराया जाता है. पटका मोठड़ा का धराया जाता है. सभी वस्त्र सफ़ेद अबीर एवं श्याम चूवा की टिपकियों के भरतकाम से सुसज्जित होते हैं. मोजाजी पतंगी रंग के एवं ठाड़े वस्त्र पतंगी रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा – मोती, माणक, पन्ना तथा जड़ाव स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर पतंगी रंग की, श्वेत-श्याम टिपकियों वाली छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच के स्थान पर पन्ना का पट्टीदार कटिपेच, मोरपंख की सादी चन्द्रिका पर रंगीन तिकड़ी एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
श्रीकर्ण में माणक के लोलकबंदी – लड़वाले चार कर्णफूल धराये जाते हैं.
श्रीकंठ में सोने का डोरा, हमेल, चन्द्रहार अक्काजी का आदि धराये जाते हैं. लाल, पीले एवं श्वेत रंग के पुष्पों की कलात्मक थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में सोने के बंटदार वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
आरसी दोनों समय बड़ी डांडी की, पट चीड का, गोटी चांदी की और वस्त्र के छोगा आते हैं. आज छड़ी नहीं धरायी जाती है.


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