HOTEL Gahlot INN

HOTEL Gahlot INN Budget Friendly Stylish

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हम दूसरों की तरह सफल जीवन तो जीना चाहते हैं, लेकिन उनकी तरह परिश्रम नहीं करना चाहते हैं। दूसरों की सफलता हमें आकर्षित कर...
22/01/2026

हम दूसरों की तरह सफल जीवन तो जीना चाहते हैं, लेकिन उनकी तरह परिश्रम नहीं करना चाहते हैं। दूसरों की सफलता हमें आकर्षित करती है, लेकिन उस सफलता के मूल में जो परिश्रम और पुरुषार्थ उसके द्वारा किया जाता है, हम उससे अनभिज्ञ बने रहना चाहते हैं, हम उससे बचे भी रहना चाहते हैं। हमारी वाह्य दृष्टि दूसरों के बाहरी विलास को तो देख पाती है, लेकिन उसके प्रयास को नहीं देख पाती है।

दूसरों के जैसे बनने के लिए उनके जैसा प्रयास भी हमें करना पड़ेगा ये बात हम भूल जाते हैं। किसी की सफलता को नहीं अपितु उसके द्वारा किये गये परिश्रम और पुरुषार्थ को देखने की दृष्टि उत्पन्न करो। जिस दिन हम दूसरों के सफल जीवन को देखने के बजाय उसके मूल में छुपे परिश्रम पर अपना ध्यान केंद्रित कर लेंगे निश्चित ही उस दिन हमारा जीवन भी सफलता के पथ का पथिक बन जायेगा।🖋️

जय श्री कृष्ण
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30/10/2025
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25/10/2025

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"जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥" (गीता 2.27)अर्थ: जो जन्म लेता ...
05/10/2025

"जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥" (गीता 2.27)अर्थ: जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरता है, उसका जन्म निश्चित है। इसलिए, इस अनिवार्य तथ्य के लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जीवन और मृत्यु एक चक्र है, और यह सब कुछ प्रकृति का नियम है। जो कुछ भी हमारा है, वह पहले किसी और का था, और आगे भी किसी और का होगा।

28/09/2025

🪔 अध्याय 13 श्लोक 22 🪔
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥22॥

✍अनुवाद:
पुरुष अर्थात जीव प्रकृति में स्थित हो जाता है, प्रकृति के तीनों गुणों के भोग की इच्छा करता है, उनमें आसक्त हो जाने के कारण उत्तम और अधम योनियों में जन्म लेता है।

✍भाष्य:

पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह व्यक्त किया था कि पुरुष (आत्मा) सुख और दुख का अनुभव करने के लिए उत्तरदायी है। अब वे बताते हैं कि ऐसा कैसे होता है? स्वयं को शरीर मान लेने से आत्मा ऐसी गतिविधियों की ओर क्रियाशील हो जाती है जो शारीरिक सुखों के भोग की ओर निर्देशित होती है। चूंकि शरीर माया से निर्मित है इसलिए यह प्राकृत शक्ति, जो कि तीन गुणों सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से बनी है, का भोग करना चाहता है। अहंकार के कारण आत्मा स्वयं को कर्त्ता और शरीर के भोक्ता के रूप में पहचानने लगती है। शरीर, मन और बुद्धि सभी कार्यकलापों को क्रियान्वित करते हैं लेकिन आत्मा उन सबके लिए उत्तरदायी ठहरायी जाती है। जैसे किसी बस की दुर्घटना हो जाती है तब बस के पहियों और स्टेयरिंग को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। बस की किसी प्रकार की क्षति के लिए बस का चालक उत्तरदायी होता है। समान रूप से इन्द्रियाँ मन, बुद्धि और आत्मा द्वारा क्रियाशील होती है तथा ये उसके प्रभुत्व में कार्य करते हैं। इस प्रकार से आत्मा शरीर द्वारा किए गए सभी कार्यकलापों के लिए कर्म संचय करती है। अनन्त पूर्व जन्मों के कर्मों का संचित भण्डार ही इसके बार-बार उत्तम और निम्न योनियों में जन्म का कारण बनते हैं।

👇स्वामी मुकुन्दानन्द द्वारा भगवद् गीता भाष्य पढ़ने के लिए निचे दिए गए Link पर Click करे ।
https://www.holy-bhagavad-gita.org/

#स्वामीमुकुंदानन्द






*ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु 🦚**🪷🪔गीता ज्ञान 📖🪷*1- क्रोध से भ्रम उत्पन्न होता है और भ्रम बुद्धि का नाश कर देता है।2- मनुष्य अप...
27/09/2025

*ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु 🦚*
*🪷🪔गीता ज्ञान 📖🪷*

1- क्रोध से भ्रम उत्पन्न होता है और भ्रम बुद्धि का नाश कर देता है।
2- मनुष्य अपने विश्वास से निर्मित होता है। जैसा वह विश्वास करता है, वैसा ही बन जाता है।
3- सबसे बड़ा धर्म अपने धर्म का पालन करना है।
4- जो व्यक्ति अपने मन को वश में कर लेता है, उसके लिए वही मित्र हो जाता है।
5- जो व्यक्ति ज्ञान की दृष्टि से देखता है, वह हर जीव में एक ही आत्मा को देखता है।
6- इस संसार में ज्ञान से बढ़कर कोई संपत्ति नहीं है और अज्ञानता से बड़ा कोई शत्रु नहीं है।
7- असली ज्ञान की प्राप्ति सत्य, धैर्य और समर्पण से ही संभव है।
8- कभी भी अपने प्रयासों को व्यर्थ नहीं समझना चाहिए, हर प्रयास सफलता की ओर ले जाता है।
9- सच्चा विद्यार्थी वही होता है जो धैर्यवान और जिज्ञासु होता है।
10- सफलता का सबसे बड़ा रहस्य निरंतर अभ्यास में छिपा होता है।
*जय श्री कृष्ण🦚*

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305022

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