20/11/2017
हर-की-दून
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अगर किसी एक ट्रैक पर बहुत कुछ एक साथ देखना हो तो हर-की-दून का नाम मेरे जेहन में सबसे पहले आता है। जौनसार क्षेत्र को गढ़वाल के रहस्यमयी क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। जैसे बच्चों को काले जादू का नाम लेकर डराया जाता है वैसे ही पहाड़ में जौनसार का जादू प्रसिद्ध है।
असल में जिस क्षेत्र के बारे में अधिक जानकारी न हो वहां के बारे में भ्रांतियों का होना कोई नई बात नहीं है। अक्सर यही होता है। वैसे कुछ हद तक सही भी है। उत्तराखण्ड का यह क्षेत्र हर मायने में अलग है। प्राकृतिक खूबसूरती तो यहां पग-पग पर है ही इसके साथ यहां का रहन-सहन, पहनावा, बोली-भाषा, त्योहार हर चीज निराली है।
जहां टोंस नदी के एक ओर पांडवों को पूजा जाता है वहीं दूसरी ओर कौरवों की पूजा होती है। दुर्योधन उनके इष्ट देव हैं। हनोल के महासू देवता हों या नेटवार के पोखुराज देवता। जिनके दरबार मे आज भी न्याय के लिए भक्तों की अर्जियां आती हैं। उत्तराखण्ड के कुमाऊं में गोलू देवता को भी न्याय के देवता के रूप में पूजा जाता है।
हर-की-दून घाटी में ट्रैकिंग के दौरान यहां के रीति रिवाज व सामाजिक व्यव्यस्थाओं से परिचित होने का मौका भी मिलता है। यहां के गांवों में शराब पर प्रतिबंध लगाने की मिसाल अपने आप में महत्वपूर्ण है। यहां महिलाओं द्वारा गांव में शराब पिये किसी भी इंसान को पाए जाने पर उस पर एक भेड़ व कुछ नकद का जुर्माना लगाया जाता है। जिसका पालन पूरा गांव करता है। चूंकि विकास की दृष्टि से यह क्षेत्र अभी भी बहुत ही पिछड़ा है, गांवों में अभी भी बिजली नहीं है, टेलीफोन के नाम पर गांव में सिर्फ एक सेटेलाइट फोन कहीं मिल जाएगा।
फिर भी यहां जाकर मिलनसार स्थानीय निवासियों के साथ कुछ दिन बिताना अपने आप में एक जिंदगी भर न भूल पाने वाली याद होती है। हर-की-दून पहुंचकर जहां प्रकृति से एकाकार होने का सुअवसर मिलता है, वहीं जौनधार ग्लेशियर से निकलती सुपिन नदी के किनारे चमचमाते तारों के नीचे रात बिताना स्वर्गिक सुख का अनुभव करवाता है।